Sunday, March 22, 2026
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मध्य पूर्व संकट: इजराइल-ईरान युद्ध और भारत की कुशल कूटनीति

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मध्य पूर्व संकट: इजराइल-ईरान युद्ध और भारत की कुशल कूटनीति
मध्य पूर्व संकट: इजराइल-ईरान युद्ध और भारत की कुशल कूटनीति
अवनीश कुमार गुप्ता
अवनीश कुमार गुप्ता

जब हम इक्कीसवीं सदी के वैश्विक परिदृश्य को देखते हैं, तो मध्य पूर्व की बदलती भू-राजनीति और वहां सुलगता संघर्ष पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। वर्तमान समय में इजराइल और अमेरिका का एक पक्ष तथा ईरान और उसके समर्थित गुटों का दूसरा पक्ष आमने-सामने है, जिसने विश्व को एक नए शीत युद्ध की दहलीज पर खड़ा कर दिया है। यह संघर्ष केवल मिसाइलों और ड्रोन हमलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह साइबर युद्ध, आर्थिक प्रतिबंधों और कूटनीतिक चालों का एक जटिल जाल है। इस महायुद्ध की आहट न केवल खाड़ी देशों के लिए चिंता का विषय है, बल्कि भारत जैसे उभरते हुए वैश्विक शक्ति केंद्र के लिए भी एक बड़ी परीक्षा साबित हो रही है। भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है क्योंकि उसके हित इजराइल और अमेरिका के साथ जितने गहरे हैं, उतने ही सामरिक और ऊर्जा संबंधी संबंध ईरान के साथ भी जुड़े हुए हैं।

इजराइल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव अब सीधे टकराव में बदल चुका है, जहां दोनों देश एक-दूसरे की संप्रभुता को चुनौती दे रहे हैं। इजराइल के लिए यह अपनी अस्तित्व की रक्षा का प्रश्न है, जबकि ईरान इस क्षेत्र में अपने प्रभाव को बनाए रखने और पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए प्रतिबद्ध है। अमेरिका इस पूरे समीकरण में इजराइल का सबसे बड़ा सहयोगी बनकर खड़ा है, जो न केवल सैन्य सहायता प्रदान कर रहा है बल्कि ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाकर उसकी कमर तोड़ने की कोशिश कर रहा है। इस टकराव का असर वैश्विक तेल बाजार, आपूर्ति श्रृंखला और समुद्री व्यापार मार्गों पर स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है। विशेष रूप से लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण व्यापारिक रास्तों पर मंडराता खतरा वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका है, और भारत के व्यापारिक हित सीधे तौर पर इन रास्तों से जुड़े हुए हैं। भारत की स्थिति इस पूरे प्रकरण में अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण है।

भारत ने हमेशा से एक संतुलित विदेश नीति का अनुसरण किया है, जिसे रणनीतिक स्वायत्तता के रूप में जाना जाता है। इजराइल के साथ भारत के संबंध पिछले कुछ दशकों में काफी प्रगाढ़ हुए हैं, खासकर रक्षा, प्रौद्योगिकी और कृषि के क्षेत्र में। इजराइल भारत का एक भरोसेमंद सैन्य आपूर्तिकर्ता रहा है। वहीं दूसरी ओर, ईरान के साथ भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। चाबहार बंदरगाह जैसी परियोजनाएं भारत के लिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंचने का एक महत्वपूर्ण द्वार हैं। ऐसे में भारत के लिए किसी एक पक्ष का चुनाव करना लगभग असंभव है, क्योंकि दोनों ही देश भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए अनिवार्य हैं।

भारतीय कूटनीति इस समय एक बारीक तार पर चलने के समान है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने ‘सभी के साथ दोस्ती’ की नीति को आगे बढ़ाया है। भारत ने इजराइल पर होने वाले आतंकी हमलों की निंदा की है, तो साथ ही साथ फिलिस्तीन के मानवीय संकट पर भी अपनी चिंता जताई है। ईरान के संदर्भ में भारत ने हमेशा बातचीत और कूटनीति के माध्यम से समाधान निकालने पर जोर दिया है। भारत जानता है कि यदि ईरान और इजराइल के बीच पूर्ण पैमाने पर युद्ध छिड़ता है, तो इसका सबसे बड़ा खामियाजा भारत को भुगतना पड़ेगा। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा और खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर भी संकट पैदा हो जाएगा। इसलिए भारत की कूटनीति का मुख्य उद्देश्य इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखना है।

भारत की कूटनीतिक भूमिका अब केवल एक मूकदर्शक की नहीं रह गई है, बल्कि वह एक सक्रिय मध्यस्थ के रूप में उभर रहा है। हाल के वर्षों में भारत ने जिस तरह से यूक्रेन-रूस संघर्ष में अपनी स्वतंत्र आवाज उठाई है, वैसी ही उम्मीद मध्य पूर्व के मामले में भी की जा रही है। भारत अपनी जी-20 की अध्यक्षता और ग्लोबल साउथ के नेतृत्व के माध्यम से यह संदेश देने में सफल रहा है कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। इजराइल और ईरान दोनों ही देश भारत का सम्मान करते हैं और भारतीय नेतृत्व की बात को गंभीरता से लेते हैं। यह भारत के लिए एक अवसर भी है कि वह वैश्विक मंच पर एक शांतिदूत के रूप में अपनी छवि को और मजबूत करे और दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने का प्रयास करे।

अमेरिका के साथ भारत की बढ़ती नजदीकी ने भी इस समीकरण को दिलचस्प बना दिया है। अमेरिका चाहता है कि भारत इस क्षेत्र में एक सक्रिय भूमिका निभाए, विशेषकर समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में। हालांकि भारत ने स्पष्ट किया है कि वह किसी भी सैन्य गुट का हिस्सा नहीं बनेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों और नौवहन की स्वतंत्रता के पक्ष में खड़ा रहेगा। भारत की यह स्पष्टता उसे अन्य देशों से अलग करती है। भारत ने ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद चाबहार के विकास को जारी रखा है, जो यह दर्शाता है कि भारत अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं के साथ समझौता नहीं करेगा।

यह भारत की परिपक्व कूटनीति का ही परिणाम है कि वह एक तरफ इजराइल के साथ ‘आई2यू2’ जैसे समूहों में शामिल है और दूसरी तरफ ईरान के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को भी संजोकर रखे हुए है। इस संघर्ष का एक महत्वपूर्ण पहलू तकनीकी और साइबर युद्ध भी है। इजराइल और ईरान दोनों ही देश उन्नत साइबर क्षमताओं से लैस हैं। भारत के लिए यह एक चेतावनी की तरह है कि भविष्य के युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं बल्कि कंप्यूटर नेटवर्क पर भी लड़े जाएंगे। भारत अपनी साइबर सुरक्षा को मजबूत करने के लिए इजराइल के साथ सहयोग कर रहा है, जो भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को सुरक्षित रखने के लिए महत्वपूर्ण है। वहीं ईरान के साथ डेटा और संचार के क्षेत्र में सहयोग की अपनी संभावनाएं हैं। भारत को इस डिजिटल युद्ध के दौर में अपनी सुरक्षा प्रणालियों को और अधिक चाक-चौबंद बनाना होगा ताकि वैश्विक अस्थिरता का प्रभाव भारत की आंतरिक सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर न पड़े।

भारतीय विदेश नीति का एक और महत्वपूर्ण स्तंभ खाड़ी के अन्य अरब देश हैं, जैसे सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात। ये देश भी इजराइल और ईरान के संघर्ष के बीच अपनी राह तलाश रहे हैं। भारत के संबंध इन देशों के साथ भी बहुत मजबूत हुए हैं। भारत ने अब्राहम समझौते का समर्थन किया, जिसने इजराइल और कुछ अरब देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाया। यह भारत की दूरगामी सोच को दर्शाता है कि वह इस पूरे क्षेत्र को एक एकीकृत आर्थिक गलियारे के रूप में देखता है। इंडिया-मिडल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं इसी सोच का हिस्सा हैं, लेकिन ईरान-इजराइल संघर्ष इन परियोजनाओं के भविष्य पर सवालिया निशान लगा रहा है। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह कैसे इस तनाव को कम करके आर्थिक सहयोग के इन रास्तों को सुरक्षित रख सके।


निष्कर्षतः इजराइल-अमेरिका और ईरान के बीच का यह मौजूदा संघर्ष वैश्विक कूटनीति के लिए एक अग्निपरीक्षा है। भारत अपनी रणनीतिक गहराई और संतुलित दृष्टिकोण के कारण इस विवाद में एक महत्वपूर्ण हितधारक है। भारत का मुख्य ध्यान अपनी ऊर्जा सुरक्षा, नागरिकों के हितों और क्षेत्रीय शांति पर केंद्रित है।

भारतीय कूटनीति ने अब तक बहुत बुद्धिमानी से काम लिया है, लेकिन भविष्य की राह और भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है। भारत को अपनी तटस्थता बनाए रखते हुए एक सक्रिय भूमिका निभानी होगी, ताकि मध्य पूर्व में अस्थिरता का यह बादल छंट सके। भारत की यह यात्रा न केवल उसकी विदेश नीति की सफलता को परिभाषित करेगी, बल्कि यह भी तय करेगी कि आने वाले समय में विश्व व्यवस्था में भारत का स्थान कितना ऊंचा होगा। कूटनीति का अर्थ केवल समस्याओं से बचना नहीं, बल्कि समस्याओं के समाधान का हिस्सा बनना है, और भारत आज इसी पथ पर अग्रसर है।