Thursday, February 12, 2026
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सुरक्षित डिजिटल भविष्य: सावधानी, शिक्षा और सशक्त निगरानी की जरूरत

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सुरक्षित डिजिटल भविष्य: सावधानी, शिक्षा और सशक्त निगरानी की जरूरत
सुरक्षित डिजिटल भविष्य: सावधानी, शिक्षा और सशक्त निगरानी की जरूरत
सुनील कुमार महला
    सुनील कुमार महला

आज एआई का दौर है, सूचना क्रांति का युग है,जहाँ मशीनें मनुष्य सोच को नई उड़ान देती हैं।सच तो यह है कि आज के समय में ज्ञान, काम और रचनात्मकता सब बदल रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो मानव और तकनीक मिलकर भविष्य गढ़ रहे हैं। वास्तव में यह युग है नवाचार, गति और असीम संभावनाओं का, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमता (एआइ) ने जहां रचना और सूचना प्रसार को नई गति दी है, वहीं इसके दुरुपयोग भी गंभीर चिंता पैदा कर रखी है।

यहां यदि हम सरल शब्दों में कहें तो डीपफेक वीडियो, नकली तस्वीरें और एआई से बनी झूठी सामग्री लोगों को धोखा दे रही हैं और उनकी बदनामी भी कर रही हैं। इससे साइबर ठगी बढ़ रही है और समाज में भ्रम फैल रहा है। बहरहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि साइबर ठगी पर हाल ही में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने यह बात कही है कि यह एक गंभीर और तेजी से बढ़ता अपराध है, जो आम लोगों की मेहनत की कमाई और भरोसे दोनों को नुकसान पहुंचा रहा है।

अदालत ने इसे केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक खतरा बताते हुए सरकार और एजेंसियों को इससे सख्ती से निपटने की जरूरत पर जोर दिया है।इस क्रम में हाल ही में केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए नियम बहुत सख्त कर दिए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) द्वारा तैयार हर फोटो, वीडियो पर स्पष्ट लेबल लगाना अनिवार्य होगा। इसके अलावा अगर इन प्लेटफॉर्म्स पर कोई गलत, गैर-कानूनी वीडियो या फोटो डाली जाती है, तो कंपनियों को उसे सूचना मिलने के सिर्फ तीन घंटे में हटाना होगा।

गौरतलब है कि सरकार ने डीपफेक और एआई के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए यह कदम उठाया है। यह नए नियम 20 फरवरी से लागू होंगे। उल्लंघन करने पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और अन्य कानूनों के तहत कार्रवाई एवं जुर्माना लग सकता है। यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 10 फरवरी 2026 मंगलवार को सभी विभागों को यह निर्देश दिया कि लोगों को साइबर धोखाधड़ी से बचाने के लिए मिलकर काम करना चाहिए। सभी बैंक, आई4सी, विभाग सामूहिक प्रयास करें, ताकि ठगों को जल्द से जल्द पकड़ा जा सके। इतना ही नहीं,केंद्रीय मंत्री श्री शाह ने आरबीआई और गृह मंत्रालय द्वारा बनाए गए म्यूल अकाउंट हंटर ऐप को सभी बैंकों को अपनाने की सलाह दी है।

उन्होंने सीबीआई द्वारा गृह मंत्रालय के भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (आई4 सी) के सहयोग से आयोजित सम्मेलन के दौरान यह बात कही है कि देश में हर 37 सेकंड में एक व्यक्ति साइबर ठगों का शिकार बन रहा है। प्रति घंटे औसतन सौ लोग इसकी चपेट में आ रहे हैं। वर्ष 2021 में जहां 52 हजार शिकायतें थीं, वहीं अब यह संख्या 86 हजार हो गई है।गृह मंत्री ने कहा, जितनी तेजी से डिजिटल लेनदेन बढ़े हैं, उतनी ही तेजी से जोखिम बढ़ा है। पहले यह ‘लोन वुल्फ अटैक’ हुआ करता था, अब यह संगठित अपराध के रूप में सामने आ रहा है। अपराधी नई तकनीक अपना रहे हैं, इसलिए हमें सामूहिक प्रयास करने होंगे।

गौरतलब है कि इस क्रम में यानी कि साइबर सुरक्षा के मद्देनजर 12 लाख सिम कार्ड भी रद्द किए गए हैं।इस दौरान श्री शाह ने 1930 के कॉल सेंटर पर पर्याप्त संख्या में कॉल हैंडलर तैनात करने के भी निर्देश दिए हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि साइबर धोखाधड़ी के विभिन्न खतरों को देखते हुए केंद्र सरकार ने आईटी नियम, 2021 में जो नया बदलाव किया है, वह इंटरनेट को सुरक्षित और भरोसेमंद बनाने की दिशा में एक जरूरी और सही व सकारात्मक कदम है। जैसा कि इस आलेख में ऊपर भी चर्चा कर चुका हूं कि आगामी 20 फरवरी से लागू होने जा रहे इन नियमों के तहत अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) से तैयार किए गए फोटो और वीडियो पर लेबल लगाना अनिवार्य होगा। इसके साथ ही फेक कंटेंट को हटाने की समय सीमा 36 घंटे से घटाकर मात्र तीन घंटे कर दी गई है।

बहुत अच्छी बात यह है कि नए प्रावधानों के तहत एआइ कंटेंट में स्थायी मेटाडेटा और डिजिटल पहचान चिह्न जोड़ने की अनिवार्यता भी तय की गई है, ताकि ऐसे कंटेंट की पहचान आसानी से की जा सके। यह बदलाव डिजिटल पारदर्शिता और नागरिक सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम है। नए नियमों का सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि अब एआइ से बने कंटेंट को छिपाना आसान नहीं रहेगा। वास्तव में, डिजिटल सामग्री पर सही लेबल और पहचान चिह्न होने से आम आदमी यह समझ सकेगा कि जो वह देख रहा है, वह असली है या तकनीक से बनाई गई है। इससे सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहें और झूठी खबरें कम होंगी। खासकर चुनाव, सामाजिक मुद्दों और संवेदनशील घटनाओं के समय यह लोकतंत्र को सुरक्षित रखने में मदद करेगा।

लेकिन सिर्फ नियम बना देना काफी नहीं है।यह भी बहुत ही ज़रूरी व आवश्यक है कि उन्हें सख्ती से पूरे देश में लागू भी किया जाए, क्योंकि डिजिटल प्लेटफॉर्म बहुत ज़्यादा हैं और कंटेंट की मात्रा भी बहुत बड़ी है। यहां यदि हम आंकड़ों की बात करें तो भारत में आज डिजिटल प्लेटफॉर्म और कंटेंट का दायरा तेज़ी से फैल चुका है। देश में 90 करोड़ से अधिक इंटरनेट यूज़र हैं और स्मार्टफोन के ज़रिये डिजिटल खपत लगातार बढ़ रही है। यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप और एक्स (ट्विटर) जैसे प्लेटफॉर्म पर करोड़ों सक्रिय यूज़र रोज़ाना वीडियो, रील्स, न्यूज़, पॉडकास्ट और शॉर्ट-फॉर्म कंटेंट देख रहे हैं। भारत दुनिया के सबसे बड़े ऑनलाइन वीडियो बाज़ारों में गिना जाता है, जहाँ औसतन एक यूज़र दिन में कई घंटे डिजिटल कंटेंट पर बिताता है।

ओटीटी प्लेटफॉर्म (नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम, हॉटस्टार आदि) के सब्सक्राइबर भी करोड़ों में हैं, जबकि डिजिटल न्यूज़, क्रिएटर इकॉनमी और लोकल-भाषा कंटेंट की हिस्सेदारी तेज़ी से बढ़ी है। कुल मिलाकर, भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म आज सूचना, मनोरंजन, शिक्षा और रोज़गार-चारों के लिए एक मज़बूत आधार बन चुके हैं। इसलिए मजबूत तकनीकी निगरानी, प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी तय करना और नियम तोड़ने पर तुरंत कार्रवाई करना जरूरी है। अगर नियमों को हल्के में लिया गया, तो उनका कोई फायदा नहीं होगा।इसके साथ ही नागरिकों में डिजिटल साक्षरता बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है। लोगों को यह समझना होगा कि हर वायरल वीडियो या तस्वीर सत्य नहीं होती। जागरूक उपयोगकर्ता ही फेक कंटेंट की श्रृंखला को तोड़ सकता है।

सरकार, सोशल मीडिया कंपनियों और शैक्षणिक संस्थानों को मिलकर इस दिशा में काम करना होगा। भ्रमजाल फैलने से रोकने के लिए सरकार और समाज दोनों के साझा प्रयासों की दरकार है। अंत में निष्कर्ष के तौर पर यही कहूंगा कि डिजिटल तकनीक ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन इसके साथ-साथ डिजिटल धोखाधड़ी एक गंभीर चुनौती बनकर उभरी है। फर्जी कॉल, फ़िशिंग लिंक, नकली ऐप, साइबर ठगी और डेटा चोरी जैसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, जिनका सीधा असर आम नागरिकों की आर्थिक सुरक्षा और भरोसे पर पड़ता है। यह समस्या केवल तकनीकी नहीं, बल्कि जागरूकता, कानून और साइबर सुरक्षा व्यवस्था से भी जुड़ी हुई है। जब तक उपयोगकर्ता सतर्क नहीं होंगे, डिजिटल साक्षरता नहीं बढ़ेगी और नियमों का सख़्ती से पालन नहीं होगा, तब तक इस खतरे पर पूरी तरह अंकुश लगाना मुश्किल है। इसलिए सुरक्षित डिजिटल भविष्य के लिए सावधानी, शिक्षा और मजबूत निगरानी तंत्र तीनों अनिवार्य हैं।