

लोकतंत्र समानता और न्याय के वादे पर खड़ा होता है— लेकिन जब भारतीय समाज की ज़मीन पर जाति की सच्चाई सामने आती है, तो यही वादा बार-बार कठघरे में खड़ा नज़र आता है। संविधान बराबरी की गारंटी देता है… पर सवाल आज भी ज़िंदा है— क्या अवसर, सम्मान और न्याय सच में सबको एक-सा मिल रहा है?
संसद से लेकर सड़क तक, अदालत से लेकर प्रशासन तक— जाति कई बार अदृश्य रहती है, लेकिन उसका असर हर जगह साफ़ दिखाई देता है। लोकतंत्र के ढाँचे मज़बूत हैं, क़ानून लिखे गए हैं, संविधान स्पष्ट है— फिर भी सामाजिक चेतना आज भी बराबरी की परीक्षा में फेल क्यों हो जाती है?——जब तक न्याय केवल किताबों में रहेगा और व्यवहार में नहीं उतरेगा, तब तक लोकतंत्र की आत्मा अधूरी ही रहेगी। बराबरी की परीक्षा में समाज बार-बार क्यों हार जाता है?
लोकतंत्र बनाम हकीकत—-भारत का लोकतंत्र सिर्फ़ एक शासन प्रणाली नहीं, बल्कि एक नैतिक संकल्प है— समानता, न्याय और बंधुत्व का। लेकिन आज एक असहज सवाल सामने है— क्या हम इस संकल्प के साथ ईमानदार हैं? —-या फिर लोकतंत्र का यह ढांचा भीतर से दरक चुका है, जहाँ कानून, व्यवस्था और सत्ता— तीनों ही जाति, वर्ग और पहचान की गिरफ़्त में हैं? जब तक न्याय… सिर्फ़ क़ानून की किताबों में रहेगा…और व्यवहार में नहीं उतरेगा…
तब तक लोकतंत्र की आत्मा… अधूरी ही रहेगी।
कानून किसके लिए? आज क़ानून बनते हैं, संशोधन होते हैं, नए प्रावधान जोड़े जाते हैं— लेकिन मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक हो गया है। क्या ये क़ानून नागरिक के लिए हैं, या किसी खास वर्ग, जाति या वोट बैंक के लिए? जब तर्क और न्याय की जगह पहचान क़ानून का आधार बनने लगे, तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ना तय है।
न्याय व्यवस्था पर संकट———न्यायालय— जहाँ आख़िरी उम्मीद जाकर टिकती है। लेकिन जब यह धारणा बनने लगे कि न्याय की दहलीज़ पर पहुँचने से पहले जाति, हैसियत और राजनीतिक संरक्षण देखा जा रहा है, तो भरोसे की नींव हिल जाती है। न्याय सिर्फ़ फैसला नहीं होता— वह भरोसा होता है। और जब भरोसा टूटता है, तो असर पूरे समाज पर पड़ता है।
लोकतंत्र और सच का क्षरण—– लोकतंत्र में सच का क्षरण एक दिन में नहीं होता।—पहले असहज सवाल ‘राष्ट्र-विरोधी’ कहलाते हैं, फिर आलोचना ‘साज़िश’ बन जाती है, और अंत में सच बोलने वाले हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं।जब संसद में बहस समाधान नहीं, सिर्फ़ शोर बन जाए— तो समझ लेना चाहिए लोकतंत्र औपचारिक है, आत्मा संकट में है।
फूट डालो की राजनीति—- समरसता की बातें हर मंच से होती हैं, लेकिन समाज में विभाजन गहराता जा रहा है— जाति के नाम पर, —- धर्म के नाम पर, —- पहचान के नाम पर।—आज ‘फूट डालो और राज करो’—इतिहास नहीं, समकालीन राजनीति की रणनीति बन चुका है।–जब जनता आपस में उलझी रहती है, तो सत्ता से सवाल करने की ताक़त कमज़ोर पड़ जाती है।
सबसे बड़ी विडंबना—- एक ओर कहा जाता है— जाति अप्रासंगिक है।—दूसरी ओर— हर चुनाव, हर टिकट,
हर नीति जातिगत गणित पर टिकी होती है। अगर जाति सच में ख़त्म हो चुकी होती, तो राजनीति में वह इतनी निर्णायक क्यों होती?
टूटता विश्वास—- निराशा केवल बेरोज़गारी या महँगाई से नहीं बढ़ती,—बल्कि विश्वास के टूटने से बढ़ती है। जब सत्ता समाज को जोड़ने की बजाय बाँटने लगे, आलोचना से डरने लगे, और असहमति दबाने लगे— तो लोकतंत्र का नैतिक आधार कमजोर हो जाता है।
सवाल जनता से— यह किसी एक सरकार या दल पर आरोप नहीं— यह एक सामूहिक आत्ममंथन है। लोकतंत्र सिर्फ़ शासकों की नहीं, नागरिकों की भी जिम्मेदारी है।—-सवाल पूछना, असहमति जताना, और सच के साथ खड़ा होना— यही लोकतंत्र की असली ताक़त है।—-अगर आज हम चुप रहे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे पूछेंगी— जब समाज बाँटा जा रहा था, जब न्याय पहचान पूछ रहा था, और जब सच दबाया जा रहा था— तब आपने क्या किया?
























