
देश के लोकतंत्र पर सबसे बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर विपक्ष ने ऐसा बयान दे दिया है, जिसने सियासत में भूचाल ला दिया। “अगर चुनाव आयोग का कोई झंडा है, तो वो भाजपाइयों के घर पर लगा दो”—इस एक लाइन ने पूरे राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। आखिर क्यों लगा विपक्ष को ऐसा कहने की ज़रूरत?
अखिलेश यादव ने कहा है कि अब तो उल्टा ये कहना पड़ेगा कि चुनाव आयोग का कोई झंडा हो तो वो भाजपाइयों के घर पर लगा दे। उन्होंने कहा कि अब बस यही बचा है कि चुनाव आयोग भाजपाइयों के घर पर बूथ बना दे और भाजपाइयों को पीठासीन अधिकारी। क्या चुनाव आयोग ने भाजपा को ठेके पर अपना काम दे दिया है या भाजपा ने चुनाव आयोग को संविदा पर रख लिया है।
प्रशासनिक पर्यायवाची कोश में ‘चुनाव आयोग’ को ‘भाजपा’ के पर्यायवाची के रूप में जोड़ देना चाहिए। भ्रष्ट-भाजपा शासनकाल में आश्चर्य ये नहीं है कि सरेआम वोट काटने-बढ़ाने का अपराध हो रहा है,आश्चर्य ये है कि संवैधानिक संस्थाओं को ये नज़र नहीं आ रहा है। आज वोट छीनने वाले कल को जनता का बाक़ी सब भी छीन लेंगे। बाक़ी सब में भाजपाई भी शामिल होंगे, कोई बचेगा नहीं। अखिलेश यादव ने कहा कि भाजपाई भी याद रखें, ठगों का रिश्ता, सिर्फ़ ठगी से होता है और किसी से नहीं। इस कहते हैं,अंधेर नगरी,चौपट आयोग।
क्या चुनाव आयोग अब भी स्वतंत्र है? या फिर सत्ता के साथ खड़ा नजर आ रहा है? विपक्ष के इस तीखे बयान ने लोकतंत्र की जड़ों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। “चुनाव आयोग का झंडा भाजपाइयों के घर लगना चाहिए।”























