महिला आयोग बनाम मेडिकल माफिया? KGMU से उठा सत्ता संघर्ष

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महिला आयोग बनाम मेडिकल माफिया? KGMU से उठा सत्ता संघर्ष
महिला आयोग बनाम मेडिकल माफिया? KGMU से उठा सत्ता संघर्ष
राजू यादव
राजू यादव

अपर्णा यादव बनाम सोनिया नित्यानंद:लव जिहाद से आगे क्यों पहुंच गया ‘वर्चस्व का टकराव’। लखनऊ के KGMU से उठा ‘लव जिहाद’ का मामला अब एक आरोप भर नहीं रहा। यह महिला आयोग की सख़्त दख़ल और विश्वविद्यालय की स्वायत्तता के बीच टकराव बन चुका है। अपर्णा यादव और कुलपति सोनिया नित्यानंद आमने-सामने हैं—जहाँ सवाल व्यक्ति का नहीं,सत्ता,अधिकार और वर्चस्व की सीमाओं का है। महिला आयोग बनाम मेडिकल माफिया? KGMU से उठा सत्ता संघर्ष

लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी से जुड़ा लव जिहाद का मामला अब सिर्फ एक सामाजिक या कानूनी बहस नहीं रह गया है। यह विवाद धीरे-धीरे उत्तर प्रदेश सरकार के भीतर दो प्रभावशाली महिला चेहरों के टकराव में बदलता दिख रहा है। उत्तर प्रदेश महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव और KGMU की कुलपति डॉ.सोनिया नित्यानंद आमने-सामने हैं। दोनों पक्ष न सिर्फ एक-दूसरे के आरोपों को खारिज कर रहे हैं, बल्कि अपने-अपने अधिकार क्षेत्र को सर्वोपरि बताने की कोशिश कर रहे हैं।

विवाद की शुरुआत : लव जिहाद का मामला

मामले की शुरुआत मेडिकल कॉलेज से जुड़े एक कथित लव जिहाद प्रकरण से हुई। महिला आयोग के स्तर पर इसे महिला अधिकार और सुरक्षा से जोड़कर देखा गया। अपर्णा यादव ने इस प्रकरण में सख्त कार्रवाई और जवाबदेही की बात की और कॉलेज प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए। KGMU प्रशासन और कुलपति डॉ.सोनिया नित्यानंद का कहना है कि मामला नियमों और जांच प्रक्रिया के तहत देखा जा रहा है।

मुद्दा बदल गया : अब सवाल लव जिहाद का नहीं

जैसे-जैसे बयानबाज़ी तेज हुई, यह साफ होता गया कि अब बहस का केंद्र लव जिहाद नहीं रहा। असल मुद्दा बन गया – किसका अधिकार बड़ा है..? महिला आयोग की सिफारिशें बाध्यकारी हैं या नहीं..? एक स्वायत्त मेडिकल संस्थान पर राजनीतिक या संवैधानिक निकाय का दखल कितना जायज़ है..? यानी मामला नीति से निकलकर सत्ता-संतुलन की लड़ाई में तब्दील हो गया।

अपर्णा यादव का पक्ष: महिला आयोग की ताकत

अपर्णा यादव का रुख स्पष्ट रहा, महिला आयोग का संवैधानिक दायित्व है कि वह महिलाओं से जुड़े मामलों में हस्तक्षेप करे। अगर संस्थान सहयोग नहीं करते तो सवाल उठाना ज़रूरी है। यह मामला सिर्फ एक कॉलेज का नहीं, बल्कि महिला सुरक्षा की सोच का है। अपर्णा यादव ने अपने बयान में पौराणिक प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि जैसे सीता हरण के बाद रावण के संपूर्ण वंश का विनाश हुआ और द्रौपदी के अपमान के बाद कौरव वंश का पतन हुआ वैसे ही आज देश में “हिंदू कन्या” के साथ हो रही घटनाएं बेहद खतरनाक हैं। जो अब समाप्त होना बहुत जरूरी है। अपर्णा यादव के इस बयान ने राजनीतिक और सामाजिक आलोचना को और तेज कर दिया है। समर्थक इसे महिलाओं की सुरक्षा के लिए सख्त संदेश बता रहे हैं, जबकि आलोचकों की बयानबाजी और शब्दों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। यह मामला अब सिर्फ एक विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है, बल्कि महिला सुरक्षा, कानून और सामाजिक सोच पर एक बड़ी बहस का रूप ले चुका है।

इस टकराव को लेकर यूपी सरकार के भीतर असहज स्थित है। अपर्णा यादव इस मसले पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिल भी चुकी है। दोनों ही चेहरे सरकार से जुड़े हैं। सार्वजनिक टकराव से यह संदेश जा रहा है कि सरकार के भीतर समन्वय की कमी है। विपक्ष इसे “सरकार के अंदर सरकार” की संज्ञा दे रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह मामला अगर जल्द नहीं सुलझा, तो यह बड़ा प्रशासनिक और राजनीतिक संकट बन सकता है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है। क्या सरकार बीच में दखल देकर मामला सुलझाएगी..? या यह विवाद और गहराकर राजनीतिक मुद्दा बन जाएगा..? विपक्ष इस मुद्दे को लेकर कोई बड़ा सवाल करता नहीं दिख रहा। मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी अपर्णा यादव के चलते खुल का बोलने से बच रहा है और कांग्रेस के पास इस तरह के मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की कोई ठोस योजना नहीं है। केवल सोशल मीडिया पोस्ट तक बात सीमित रह जा रही है।फिलहाल इतना तय है कि लव जिहाद का मुद्दा पीछे छूट चुका है और सामने है वर्चस्व, अधिकार और सत्ता की खुली जंग।

अपर्णा यादव ने उठाए ये सवाल

महिला डॉक्टर के उत्पीड़न मामले में महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव ने विशाखा कमेटी की जांच रिपोर्ट पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि रिपोर्ट में गलत तथ्यों को मीडिया के साथ साझा किया गया और निष्पक्ष जांच नहीं की गई। उन्होंने कहा कि जिन 8 लोगों ने बयान दिए, उन पर केजीएमयू प्रशासन की ओर से बयान बदलवाने का दबाव बनाया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि केजीएमयू की वीसी सोनिया नित्यानंद ने न तो उनका सहयोग किया और न ही उनसे ठीक से मुलाकात की, बल्कि उन्हें काफी देर तक बाहर खड़ा रखा गया। अपर्णा यादव ने कहा कि वह राज्य महिला आयोग के साथ राज्यपाल से मिलकर शिकायत करेंगी। उन्होंने केजीएमयू में छेड़खानी, धर्मांतरण, भ्रष्टाचार और पिछले दो वर्षों से गलत तरीके से संचालित ब्लड बैंक के आरोप भी लगाए।

KGMU में काफी देर चला हंगामा

KGMU पहुंचने पर कुलपति डॉ. सोनिया नित्यानंद का चैंबर बंद मिला। काफी देर तक दरवाजा नहीं खुलने पर अपर्णा यादव के समर्थकों और कार्यकर्ताओं ने हंगामा शुरू कर दिया। हंगामे के दौरान समर्थकों ने VC कार्यालय का गेट पीटा, श्रीराम के जयकारे लगाए और लव जिहाद के आरोपी डॉक्टर रमीजुद्दीन मलिक के खिलाफ नारेबाजी की। आरोप है कि समर्थक जबरन गेट ठेलकर अंदर घुस गए, जिससे चैंबर की सिटकनी टूट गई। पूरे घटनाक्रम से परिसर में अफरा-तफरी का माहौल बन गया।

कुलपति ने दी चेतावनी

  KGMU की कुलपति डॉ.सोनिया नित्यानंद ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि एक महिला कुलपति के लिए इस तरह के शब्दों और व्यवहार का इस्तेमाल निंदनीय है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सैंकड़ों लोग बिना सूचना के चैंबर में घुसकर नारेबाजी करेंगे, तो क्या कुलपति और शिक्षक सुरक्षित रहेंगे? कुलपति डॉ. सोनिया नित्यानंद ने कहा कि अपर्णा यादव के आने की कोई जानकारी प्रशासन को नहीं दी गई थी। इस तरह का माहौल बनाकर विश्वविद्यालय में काम करना संभव नहीं है। उन्होंने अपर्णा यादव द्वारा लगाए गए आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया। कुलपति ने यह भी कहा कि शिक्षक और कर्मचारी खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, ऐसे में KGMU परिवार पीस मार्च निकालेगा और जरूरत पड़ी तो कार्य बहिष्कार (बायकॉट) का रास्ता भी अपनाया जाएगा।

प्रो.सोनिया नित्यानंद, कुलपति KGMU ने कहा कि यौन शोषण की शिकायत मिलने पर बिना देरी किए विशाखा कमेटी गठित की गई। कमेटी की प्रारंभिक रिपोर्ट पर आरोपित रेजिडेंट डाक्टर को निलंबित करने के साथ परिसर में प्रवेश वर्जित किया गया। रिकार्ड समय में फाइनल रिपोर्ट आने के बाद महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा को आरोपित का दाखिला रद करने व केजीएमयू से बर्खास्त करने की सिफारिश की गई है। मुख्यमंत्री ने विशाखा समिति की रिपोर्ट पर कार्रवाई और केजीएमयू की ओर से उठाए गए कदमों पर संतोष जाहिर किया। सीएम ने आश्वासन दिया है कि कुलपति कार्यालय में हुई घटना की वजह की वह खुद जांच कराएंगे।

कुलपति ने राज्यपाल और मुख्यमंत्री को दी जानकारी….

विशाखा कमेटी की रिपोर्ट से लेकर अब तक हुई कार्रवाई से भी अवगत कराया। मुख्यमंत्री ने उठाए गए कदम पर संतोष जताया और यह भरोसा दिलाया कि केजीएमयू व कुलपति कार्यालय का सम्मान और सुरक्षा सरकारी की जिम्मेदारी है। कुलपति ने राज्यपाल आनंदीबेन पटेल से मुलाकात की और उन्हें भी घटना की पूरी जानकारी दी।

आज एफआइआर नहीं तो कल से कार्य बहिष्कार करेंगे केजीएमयू के डाक्टर…

केजीएमय की कुलपति प्रो.सोनिया नित्यानंद ने सोमवार को मुख्यमंत्री योगी से मुलाकात की। प्रो. नित्यानंद ने नौ जनवरी को कुलपति कार्यालय में हुए बवाल की पूरी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सभी शिक्षकों एवं छात्र-छात्राओं में रोष है। सभी मंगलवार से कार्य बहिष्कार का निर्णय ले चुके थे, लेकिन मेरे अनुरोध पर एक दिन के लिए आंदोलन टाल दिया गया है। शिक्षक संघ के अध्यक्ष प्रो. केके सिंह के अनुसार, अब तक एफआइआर दर्ज नहीं की गई। यदि मंगलवार को पुलिस मुकदमा नहीं लिखती है तो बुधवार से कार्य बहिष्कार किया जा सकता है।

अपर्णा यादव ने KGMU के VC से किये 8 सवाल-

  1. महिला डॉक्टरों का लगातार शारीरिक एवं मानसिक उत्पीड़न क्यों हो रहा है?
  2. केजीएमयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में धर्मांतरण जैसे मुद्दों पर केजीएमयू प्रशासन की तरफ से सख्त कार्रवाई क्यों नहीं की जाती है?
  3. विशाखा कमेटी पीड़िताओं के मामलों में निष्पक्ष जांच क्यों नहीं करती है?
  4. क्यों लगातार विशाख कमेटी की रिपोर्ट संदिग्ध पाई जाती है?
  5. ब्लड स्टोरेज क्यों बंद पड़ा था?
  6. डिपार्टमेंट की तरफ से सरकार को क्यों अंधकार में रखा जाता है?
  7. केजीएमयू की महिला पीड़िताओं को महिला आयोग में आने से क्यों रोका जाता है?
  8. पीएम मोदी और सीएम योगी का स्वस्थ्य भारत का जो सपना है, उनके सपने को धवस्त करने का काम केजीएमयू क्यों कर रहा है?

KGMU में लव जिहाद का पूरा मामला क्या है..?

गौरतलब है कि लखनऊ से हाल ही में लव जिहाद का मामला सामने आया था। यहां के डॉक्टर रमीज पर इसका आरोप लगा था। धर्मांतरण पर विवाद बढ़ता देख रेजिडेंट डॉक्टर रमीज को सस्पेंड कर दिया गया। इस केस की शिकायत मुख्यमंत्री पोर्टल और महिला आयोग से की गई थी। KGMU की महिला डॉक्टर ने आरोप लगाया था कि वहीं काम करने वाले दूसरे डॉक्टर ने उसपर धर्मांतरण का दबाव बनाया था। इस मामले को लेकर लखनऊ में माहौल गर्म है। धर्मांतरण के खिलाफ सख्त एक्शन की मांग की जा रही है। लखनऊ के KGMU में लव जिहाद और महिला डॉक्टरों के उत्पीड़न के आरोपों ने राजनीतिक और प्रशासनिक खलबली मचा दी है।  KGMU में धर्मांतरण की घटना कैसे हो गई..? यहां मेडिकल स्टाफ के साथ उत्पीड़न की घटनाएं क्यों हो रही हैं..? जान लें कि KGMU के धर्मांतरण से जुड़े मामले में अपर्णा यादव ने संबंधित उच्च अधिकारियों से 22 दिसंबर 2025 को लेटर भी लिखा था।

लखनऊ की प्रतिष्ठित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में उठा ‘लव जिहाद’ का मामला अब केवल एक कथित व्यक्तिगत विवाद नहीं रह गया है। यह मामला धीरे-धीरे सत्ता, संस्थागत नियंत्रण, वैचारिक वर्चस्व और राजनीतिक हस्तक्षेप के ऐसे चौराहे पर पहुंच गया है, जहां सवाल सिर्फ एक डॉक्टर या एक छात्रा का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही का बन चुका है। इस टकराव के केंद्र में हैं उत्तर प्रदेश महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव और KGMU की कुलपति प्रो. सोनिया नित्यानंद। पहली सत्ता और संवेदनशील सामाजिक मुद्दों की प्रतिनिधि हैं, दूसरी अकादमिक स्वायत्तता और संस्थागत गरिमा की संरक्षक। लेकिन यह भिड़ंत अब ‘संविधान बनाम व्यवस्था’ या ‘न्याय बनाम नियम’ से आगे निकलकर ‘वर्चस्व की राजनीति’ में तब्दील होती दिख रही है।

मामला क्या था और मुद्दा क्या बन गया..?

शुरुआत एक छात्रा के आरोप से हुई— धर्म परिवर्तन, भावनात्मक शोषण और पहचान छुपाने जैसे गंभीर आरोपों के साथ ‘लव जिहाद’ शब्द सार्वजनिक विमर्श में आया। महिला आयोग की सक्रियता स्वाभाविक थी। अपर्णा यादव ने इसे महिला अधिकार, सुरक्षा और सामाजिक चेतना से जोड़ते हुए आक्रामक रुख अपनाया। लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, सवाल KGMU प्रशासन की भूमिका पर उठने लगे। क्या यूनिवर्सिटी ने शिकायत को दबाने की कोशिश की..? क्या जांच में पारदर्शिता की कमी रही..? और सबसे बड़ा सवाल— क्या संस्थान खुद को कानून से ऊपर समझ रहा है..? यहीं से यह संघर्ष ‘न्याय’ से ‘नियंत्रण’ की लड़ाई बन गया। लेकिन सवाल उठ रहा है— क्या सरकार के भीतर समन्वय की कमी है..? विपक्ष चुप क्यों है..? सपा खुलकर क्यों नहीं बोल रही..? कांग्रेस सिर्फ पोस्ट तक सीमित क्यों..?

अपर्णा यादव: राजनीति, पहचान और दबाव की रणनीति

अपर्णा यादव केवल एक आयोग पदाधिकारी नहीं हैं। वह उस राजनीतिक धारा का प्रतिनिधित्व करती हैं, जहां सामाजिक मुद्दे सीधे सत्ता के विमर्श से जुड़ते हैं। उनका हस्तक्षेप सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक भी है— एक संदेश कि “संस्थान चाहे कितना बड़ा हो, महिला आयोग के दायरे से बाहर नहीं।” उनकी रणनीति साफ दिखी—सार्वजनिक बयान,मीडिया के जरिए दबाव,प्रशासनिक जवाबदेही की मांग और कुलपति पर सीधी सवालिया तल्खी। यह रुख उनके समर्थकों को मजबूत नेतृत्व दिखता है, जबकि आलोचक इसे संस्थागत स्वायत्तता में राजनीतिक दखल मानते हैं।

सोनिया नित्यानंद: अकादमिक शक्ति बनाम राजनीतिक हस्तक्षेप

दूसरी ओर, प्रो.सोनिया नित्यानंद चिकित्सा शिक्षा की दुनिया का बड़ा नाम हैं। KGMU जैसी संस्था की कुलपति होना केवल प्रशासनिक पद नहीं, बल्कि बौद्धिक नेतृत्व का प्रतीक है।उनका तर्क स्पष्ट रहा— विश्वविद्यालय की आंतरिक जांच प्रक्रिया,कानूनी मर्यादाएं और मीडिया ट्रायल से बचाव लेकिन चुप्पी, सीमित संवाद और कठोर प्रशासनिक भाषा ने स्थिति को और उलझा दिया। यह चुप्पी कई लोगों को अहंकार लगी, तो कुछ को संस्थागत गरिमा की रक्षा। यहीं से यह सवाल उठा— क्या अकादमिक संस्थान सामाजिक प्रश्नों पर जवाबदेही से बच सकते हैं..?

किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) से जुड़े लव जिहाद, यौन शोषण और मतांतरण के आरोपों की जांच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर अब स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) को सौंप दी गई है। एसटीएफ ने जांच शुरू भी कर दी है। साथ ही केजीएमयू प्रशासन की ओर से गठित आंतरिक जांच समिति को भंग कर दिया गया है। फैक्ट फाइंडिंग कमेटी ने कुलपति प्रो. सोनिया नित्यानंद को जांच रिपोर्ट सौंपी और आगे की जांच एसटीएफ से कराने की सिफारिश की। महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव ने मामले में पैथोलाजी विभाग के अध्यक्ष व संकाय सदस्यों पर पीड़ित महिला रेजिडेंट पर दबाव बनाने का आरोप लगाया था। ऐसे में एसटीएफ आरोपित रेजिडेंट डा.रमीजुद्दीन नायक के मददगारों पर शिकंजा कस सकती है। सोमवार को टीम केजीएमयू पहुंची और रिकार्ड खंगाले। विशाखा कमेटी ने यौन शोषण की जांच रिपोर्ट कुलपति को 10 जनवरी को सौंपी, जिसके आधार पर आरोपित का दाखिला रद करने की सिफारिश की गई।

मतांतरण की जांच के लिए पूर्व डीजीपी भावेश सिंह समेत सात सदस्यीय कमेटी गठित की गई। कमेटी ने रिपोर्ट कुलपति को सौंपकर आगे की जांच एसटीएफ से कराने की सिफारिश की। रिपोर्ट में पैथोलाजी विभाग के के संकाय सदस्यों के बयान भी दर्ज किए गए हैं। इनमें विभाग के उन दो डाक्टरों के नाम भी है जिन पर मामले को दबाने का आरोप लगा है कमेटी ने स्पष्ट तौर पर किसी भी डॉक्टर को दोषी नहीं ठहरा है

अपर्णा यादव द्वारा उठाया गया यह मामला आने वाले समय में एक नजीर बन सकता है— क्या आयोगों को विश्वविद्यालयों पर सीधा हस्तक्षेप करना चाहिए..? क्या कुलपति जवाबदेही से बच सकते हैं..? क्या संवेदनशील सामाजिक मुद्दे राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन रहे हैं..? अपर्णा यादव बनाम सोनिया नित्यानंद की यह लड़ाई दरअसल दो व्यवस्थाओं की भिड़ंत है— एक जनभावना और सत्ता की, दूसरी संस्थागत अनुशासन और अकादमिक प्रभुत्व की। सवाल यही है— इस वर्चस्व की लड़ाई में न्याय किसके साथ खड़ा होगा..? महिला आयोग बनाम मेडिकल माफिया? KGMU से उठा सत्ता संघर्ष