

मुस्लिम साहित्यकारों की दृष्टि में गंगा मैया।भारत की सबसे प्रसिद्ध और पवित्र नदी गंगा है। हमारे शास्त्रों में इस नदी के सम्बंध में बहुत सी गाथाएँ गायी जाती हैँ। गंगोत्री से लेकर समुद्र तक अपनी यात्रा में न जाने कितने लोगों को विभिन्न दृष्टिकोणों से उपकृत कर अपनी सार्थकता को साकार करती है। प्रकृत पूजा हिन्दू संस्कृति की प्रमुख पहचान है। नदियों से इस संस्कृति का अनन्य सम्बन्ध है। सच तो यह है कि हिन्दू जीवन पद्वति का उद्भव और विकास नदी तट पर ही हुआ है । जन्म से लेकर मृत्यु तक ये नदियाँ हमारे जीवन को प्रत्यक्ष और परोक्ष रुप से प्रभावित करती रहीं हैँ। संस्कृत साहित्य के वैदिक और पुराण वाःड्मय में गंगा सम्बन्धी साहित्य बहुत विशाल है। हिन्दी कवियों में गंगा स्तवन की परम्परा विद्यापति से मानी जाती है। गंगा का जादू केवल भारत तक ही सीमित नहीं था ,वह सारे संसार में फैला हुआ है।अंग्रेजी साहित्य के अनेक कवियों जैसे महाकवि शैली,एच०एच विलसन के अलावा रेजिनाल्ड हेबर,रैटरे,एटकिन्सन,एच ०एम०पारकर तथा डब्लू०एफ० थाम्पसन आदि ने गंगा पर अपने अपने भावानुसार खूब लिखा है। रही फारसी और मुस्लिम साहित्यकारों की बात तो वे भी इस कार्य में पीछे नहीं रहे। हिन्दी साहित्य के जिस महान कवि ने भागीरथी गंगा की स्तुति में तल्लीन होते हुए भावपूर्ण रचना की ,उनका नाम सैयद गुलाम नबी था।आप ही रसलीन उपनाम से चर्चित हुए। मुस्लिम साहित्यकारों की दृष्टि में गंगा
विश्नू जू के पग तें निकस के संभू सीस बसि,भगीरथ तप तें कृपा करी जहान पै।
पतितन तारिबे की रीति तेरी ऐसी गंगा,पायी रसलीन आन्ह तेरेई प्रमाण पै।
कालिमा कालिन्दी सुरसती अरुनाई दौड़, मेटि मेटि कीन्हे सेतु अपने विधान पै।
तोंहि तमोगुन ,रजोगुन सब जगत के,करके सतोगुन चढ़ावत विमान पैं।
देश के सुविख्यात राष्ट्रीय शायर नजीर बनारसी भी गंगा के रंग में इतने डूबे हुए थे कि उनकी प्रस्तुत पंत्तियाँ उसको सिद्व करके लिए पर्याप्त हैँ, जो मध्य रात्रि के बाद का प्रातःकाल का दृश्य नजीर साहब के भावो को व्यक्त करता है ….
अगर कभी आये दिल की टूटी ,लहर -लहर ने दिया सहारा।भरी है ममता से माँ की गोदी ,नहीं है गंगा का ये किनारा ॥
जो थपकियाँ मौत दे रहीं हैँ,तो लोरियाँ भी सुना रही हैँ। और इस तरह से कि जैसे माँ ,अपने बालकों को सुला रही हैँ॥
मिला है गंगा का जल जो निर्मल,उतर के ऊषा जो नहा रही है। हवा है या रागिनी है कोई टहल के बीना बजा रही है ॥
प्रातःकाल का एक दृश्य दृष्टव्य है ………..
काशी नगरी के मन्दिरों के कलश सूर्य किरणों से चमक रहे हैँ। अंधेरे करते हैं साफ रसता ,सवारी सूरज की निकल रही है ॥
किरन -किरन अब कलस-कलस को,सुनहरी माला पिन्हा रहे हैँ। है रात बाकी हवा के झोके ,अभी से कुछ गुनगुना रहे हैँ ॥
अगर कथा कह रहे हैं तुलसी ,कबीर दोहे सुना रहे हैँ। अमर हैं वे संत और साधु,जो मर के भी याद आ रहे हैँ॥
जो काशी नगरी से उठ चुके हैँ,वो मन की नगरी बसा रहे हैँ। पहन के आबे रवाँ की साड़ी,रवाँ है सीमा बवार गंगा॥
रवाँ है मौजे़ कि माँ के दिल की तरह से है बेकरार गंगा। यहाँ नहीं ऊं च -नीच कोई,उतारे है सबको पार गंगा॥
नजीर अन्तर नहीं किसी में सब अपनी माता के हैँ दुलारे। यहाँ कोई अजनबी नहीं है ,न इस किनारे न उस किनारे॥
आगरा के तेजस्वी कवि वहीद बेग ‘शाद’जिनकी ओजस्वी वाणी से कवि सम्मेलनों में राष्ट्र भक्ति का जज्बा छा जाता था,उन्होने गंगा किस रुप में देखा है…….
इस माँ ने बेटों को इतना प्यार दिया है।पाप विनाशी गंगा -जैसा दरिया बहा दिया है॥
भारत माता की धरती ने ऐसे लाल जने हैँ।जिनने खेलों -खेलों में शेरों के दाँत गिने हैँ॥
जब-जब इस धरती पर कोई विपदा आन पड़ी है।तब बेटों ने खून दिया है , इस की लाज रखी है॥
गद्दारों को हरगिज सपने नहीं सजोने देंगे। कैसे अपनी माँ के टुकड़े-टकड़े होने देंगे॥
शाद काश्मीर पर बच्चा -बच्चा कट जावेगा। अब भारत में कोई खालिस्तान न बन पायेगा॥
युवा कवि वाहिद अली वाहिद ने गंगा की उत्पतिसे लेकर उसके महात्म्य की निम्न पक्तियों में कितनी सुन्दर व्याख्या की है …….
ब्रह्मकमंडल से निकली तब रुद्र जटा में समा गयी गंगा,राजा भगीरथ के तप से इस भारत भूमि पे छा गयी गंगा।
तारनहार कहाने लगी जन मानस के मन भा गयी गंगा, विश्व में देश क ई थे परन्तु ,ये राम के देश में आ गयी गंगा।
माँ के समान जगे दिन रात जो ,प्रात हुई तो जगाती है गंगा,कर्म प्रधान सदा जग में ,सब को श्रम पंथ दिखाती है गंगा।
सन्त असंत या मुल्ला महंत सभी को गले लगाती है गंगा,ध्यान,अजान,कुरान ,पुरान से भारत एक बनाती है गंगा।
प्यारी हुई गुरु भूमि को सींच के धूल में फूल खिला रही है गंगा,घोर प्रदूषण को सहके अभी लाखों को वारि पिला रही गंगा।
ढीमर ,केवट के परिवार को जीविका नित्य दिला रही गंगा, बाँट रहे कुछ लोग हमें पर विंध्य से कंध मिला रही गंगा।
कविवर वाहिद गंगा- प्रदूषणको मानसिक विभाजन से जो सम्बद्ध कर उसे सद्भाव शशशमें परवर्तित करने हेतु हृदय स्पर्शी पंक्तियों में कहते हैँ …………
बात राम की करते हैँ तो रमजानी की बात करे,या कुरान की बात करें तो गुरुवानी की बात करें।
वाहिद चेतावनी देते हुये सचेत करते हैँ………..
गंगाजल की बातें करते,स्वयम् गटर में बैठे हैँ, मरा आँख का पानी जिनके,मत पानी की बात करें।
बस्ती के श्रमजीवी कवि रहमान अली ‘रहमान’ ने राम कथा के ‘गंगा तट पर सुमंत’ शीर्षक रचना के मार्मिक प्रसंग के भाव इन पक्तियों में कुछ इस प्रकार व्यक्त किये हैँ ।
कछ लौट चले थोड़ा चलकर ,कुछ ने तमसा को पार किया,शेष को छोड़ चले सोते ,प्रभु ने ऐसा व्यवहार किया॥
फिर पहुँच गये गंगा तट पर,केवट को प्यार अपार किया,मैं रहा देखता खड़ा-खड़ा तीनों ने गंगा पार किया॥
वर्तमान रचनाकार भी अपनी रचनाओं में गंगा का वर्णन करते रहते हैँ।
युवा शायर जावेद गोंडवी के शब्दों में ………..
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सारे हिन्दुस्ताँ की दीपावली हो जायेगी,प्यार के दीपक जलाओ रोशनी हो जायेगी।
अपनी आशाओं पे टपकाते रहो गंगा का जल,एक दिन सूखी हुई डाली भी हरी हो जायेगी।
राष्ट्रीय कवि दीनमुहम्मद ‘दीन’ का भारत प्रेम राष्ट्रीय एकता से कितना ओत प्रोत है ,जिसमें उनका स्वदेश प्यार कण -कण मे व्याप्त है ……
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गीता,रामायण हो या फिर हो कुरान की वाणी ,प्रेम सहित रहना सिखलाये करे न वह मनमानी।
नदियों का जल अमृत है ,पावन गंगा जल है,पग- पग जिसका पूजनीय है वन्दनीय हर स्थल है।
बहुचर्चित साहित्यकार राही मासूम रजा ‘महाभारत’ धारावाहिक की वजह से भारत के जनमानस पर छा गये थे। रामायण और महाभारत दो कालजयी महाकाव्य भारत की अस्मिता की पहचान हैँ।उत्तर प्रदेश के गंगा तट पर बसे गाजीपुर केअसीम प्यार के कारण ही राही मासूम रजा ने इन हृदय स्पर्शी पक्तियों में गंगा मैया को किस समर्पित भाव से काव्याजंलि प्रस्तुत की वह दृष्टव्य है …………
मुझे ले जाके गाजीपुर से गंगा की गोदी में सुला देना ,ओ मेरी माँ है,वह मेरे बदन का जहर पी लेगी । वहाँ से मुझको गाजीपुर ले जाना ,हो अगर मुमकिन तो। मुझको,अगर शायद वतन से दूर ,इतनी दूर मौत आये ,अगर उस शहर में छोटी सीएक नदी भी बहती हो तो मुझको उसकी गोदी में सुला कर उससे यह कह देना कि यह गंगा का बेटा तेरे हवाले है।
मुस्लिम साहित्यकारों की दृष्टि में गंगा
देश के स्वाधीनता वर्ष सन् १९४७ई०के रामनवमी महापर्व पर ‘रामनौमी’ शीर्षक का मुस्लिम विद्वान जनाब सैयद मुहम्मद रिज़वी मख्मूर द्वारा लिखा गया लेख आज इतने वर्षो बाद भी राष्ट्रीय एकता और अखंडता की मशाल है ,जो वर्तमान समय में भी धार्मिक उन्माद के आतंक वाद के गहन अन्धकार में भटकते समाज को भरपूर रोशनी दिखाने में समर्थ होगा । उनके रामनौमी शीर्षक विस्तृत लेख की कुछ पक्तियाँ हैँ जो भारतीय अस्मिता को रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है…..
‘जो मुझे अर्ज करनी है ,वह यह है कि मैं गरीब भी आप सब की तरह हिंदी हूँ ।’ हिमालय औऱ विन्ध्याचल ,गंगा और जमुना ,पुष्कर और अजमेर ,द्वारिकाधीश और जामा मस्जिद ,इलौरा के ग़ार औऱ ताजबीबी का रौज़ा भारत मन्दिर की मूर्तियाँ हैँऔऱ उन सब मतवालो की तरह ,जो वतन का जमाल पूजते हैँ ,मैं भी इन देवताओ का पुजारी हूँ ,मैं भी इस सरजमीं का गेहूँ खाता हूँ इसी का पानी पीता हूँ यहीं की हवा में मेरी जिन्दगी कायम है …………….
बहुभाषाविद अब्दुल रहीम खानखाना ‘रहीम’ नाम से चर्चित हैँ । रहीम मुगलकाल में प्रधान मंत्री ,तथा सेनापति थे।वे संस्कृत,फारसी,अरबी, तुर्की और हिंदी के विद्वान थे । काव्य सृजन में अग्रिम पक्ति के महाकवि एवं विश्व कवि तुलसीदास के घनिष्ठ मित्रों में थे। उनका संस्कृत में रचित ‘गंगाष्टक’ बहुत ही सुन्दर है । प्रथम श्लोक की भाव पूर्ण पक्तियाँ इस प्रकार से हैँ……

अच्युतचरणतरंगिणी शशिशेखर- मदनान्तक। मौलि-मालतीमाले मम तनु -वितरण-समये हरता देया न मे हरिता ॥
अर्थात भगवान श्रीहरि के चरण नख से आविर्भूत तथा कामारि भगवान् शिव के मस्तक पर मालती के पुष्पों की माला के समान शोभायखमान है । देवि गंगे !जब मुझे सारुप्य मुक्ति प्रदान करना ,तब श्रीहरि का स्वरुप मुझे न देना ,अपितु मुझे शिव स्वरुप प्रदान करना ,जिससे मैं आपको सर्वदा मस्तक पर धारण कर सकूँ ।(केरल हिंदी साहित्य अकादमी)’ गंगाष्टक’ अब दुष्प्राय है । विक्रम संवत् १९४३ई०में पं० राम बक्स द्वारा लिखित गंगाष्टकम् की एक प्रतिराजस्थान के भरत पुर से प्राप्त हुई थी जो प्रयाग त्रैमासिक संस्कृत पत्रिका ‘संगमनी’ में प्रकाशित कीगयी थी। इस रचना में पुण्यसलिला गंगाके प्रति रहीम की भक्ति और श्रद्वा का भरपूर परिचय मिलता है।स्तोत्र में आठ के स्थान पर दस पद्य हैँ।गंगाष्टक का प्रथम पद्य आर्या छन्द में में निबद्व है। शेष पदों की रचना पंचचामर छन्द में हुई है। संक्षेप में हम यह कह सकते हैँ कि साहित्यिक दृष्टि से गंगाष्टक एक उच्चकोटि की रचना है।नादपूर्ण अन्त्यानुप्रास,पद लालित्य ,मनोरम शब्द शय्या और भावसम्पदा ने इसके काव्य सौन्दर्य को दूना कर दिया है । भाषा का प्रवाह स्वयम् गंगा के समान ही निर्मल तथा शान्ति दायक है।
रहीम केवल तलवार के ही धनी नही थे वरन कलम के प्रयोग में भी वे समान रूप से सिद्ध हस्त थे औऱ दोनों से उन्हे प्रभूत यश की प्राप्ति हुई ,किन्तु उनको वास्तविक अमरता कलम से ही मिली । रहीम के व्यक्तित्व का कदाचित सबसे आकर्षकतथा प्रशंसनीय पक्ष यह है उन्होंने मुसलमान होते हुए भी ,हिन्दू साहित्य औऱ संस्कृति की महान धरोहर को पूर्णतया आत्मसात् कर लिया था ,और वह उनके चिन्तन औऱ लेखन में इस प्रकार रचबस गयी थी कि उनके साहित्य को पढ़कर यह जरा सा आभास तक नहीं होता है कि वह रचना किसी मुसलमान द्वारा की गयी है।
धन्य हो गंगा मैया और अन्त में अकबर औऱ बीरबल की एक वार्ता देखिये……..
एक बार अकबर ने अपने दरबारियों से पूछा,” किस नदी का पानी सबसे अच्छा है ?”सभी दरबारियो ने एक मत से उत्तर दिया .. गंगा मैया का पानी सबसे अच्छा है । बीरबल चुप रहे । जब अकबर ने बीरबल से पूछा ,तब बीरबल बोले ,”बादशाह हुजूर पानी यमुना का अच्छा है।” इसपर अकबर को बड़ी हैरानी हुई उन्होने कहा,” सभी धर्मग्रन्थों में तो गंगा जी का जल ही सबसे शुद्ध और पवित्र बताया गया है।” बीरबल ने कहा,”हुजुर मैं भला पानी की तुलना ‘अमृत’से कैसे कर सकता हूँ। गंगा जी में बहने वाला पानी केवल पानी नहीं अपितु ‘अमृत’ है उसकी तुलना पानी से नहीं की जासकती है।”बादशाह अकबर और सभी दरबारी निरुतर हो गये।गंगा मैया तो सक्षात् अमृत तुल्य हैँ। इसकी तुलना पानी से नही की जा सकती l मुस्लिम साहित्यकारों की दृष्टि में गंगा