Monday, February 23, 2026
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आर्थिक संपन्नता से सामाजिक विपन्नता का सफर

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आर्थिक संपन्नता से सामाजिक विपन्नता का सफर भी मौजूदा व्यक्तिगत विकास का एक चरित्र है गरीबी मुफलिसी बहुत न हो पर थोड़ी बहुत जरूर हो… आपके अंदर से अगर याचक खत्म हो गया तो आप बेहद सीमित हो जाएंगे बहुत साल पहले का नही आप केवल 35/40साल पहले का इतिहास रख लीजिएगा कंही अपने पास संजो लीजिए और बच्चो को बताइगा ये सब उनके लिए फिल्मी कहानी जैसा होगा और आपको ऊपर लिखी लाइनों पर कुछ न कुछ विश्वास भी जरूर हो जाएगा सरकारी नौकरी पेशेवर शहर से गाँव छुट्टी आता था पढ़ाई करने वाला युवा अपने छुट्टियों में खेती किसानी भी करता था बच्चे भी हाथ बटाते थे खेत खलिहान गाय गौरया सामाजिक ताना-बाना सबको विकास ने अधोगति मे पंहुचा दिया मोबाइल के तमाम app के मोह पाश मे जकड़ा युवा शारीरिक श्रम नही करना चाहता वो मायावी दुनिया मे झट पट अमीर होना चाहता है वो ज्यादा बुद्धिमान और तार्किक भी हो गया है उसने श्रेष्ठता को भी चुनौती दी उसे किसी की सलाह नही चाहिए तो घर परिवार नाते रिश्तेदारी मे बड़े बुजुर्ग भी अघोषित रूप से अब सलाहकार नही रहे सब तनहा हो गये बदलता हुआ सामाजिक परिवेश आपको कंही और ले जा रहा है जैसे जैसे आप विकसित और संपन्न होते जाएंगे आप तनहा होते जाएंगे हम दो हमारे दो तो ठीक है पर इससे कुछ बाहर भी निकलिए और भी हैं जो आपके ही थे पर आप से कह नही पाते क्योंकि आप आदमी से मशीन होते जा रहे हैं मशीने केवल कमांड से चलती हैं out put based कमांड पर काम करती है आप की पूरी जिंदगी app बनती जा रही है हम इतने हिस्से में बंट गये हैं कि अपने हिस्से कुछ बचा ही नहीं…