क्या ग्रेट निकोबार बनेगा भारत का सिंगापुर, या टूटेगा पर्यावरणीय संतुलन?
अजय कुमार
लखनऊ। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का सबसे दक्षिणी द्वीप ग्रेट निकोबार आज भारत की रणनीतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय बहस का केंद्र बन चुका है। करीब 90 हजार करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल से मंजूरी मिलने के बाद यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या भारत विकास और संरक्षण के बीच संतुलन साध पाएगा। ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में कहा है कि परियोजना को दी गई पर्यावरणीय स्वीकृति में पर्याप्त सुरक्षा उपाय शामिल हैं और इसे रोका नहीं जा सकता, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि हर शर्त का कड़ाई से पालन अनिवार्य होगा।
ग्रेट निकोबार द्वीप भारत का सबसे दक्षिणी बड़ा द्वीप है और भौगोलिक दृष्टि से इसकी स्थिति असाधारण मानी जाती है। यह द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य से करीब 35 से 40 नॉटिकल मील की दूरी पर स्थित है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठनों और शिपिंग डेटा के मुताबिक, दुनिया के कुल समुद्री व्यापार का लगभग 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। चीन के कुल ऊर्जा आयात का करीब 60 प्रतिशत और जापान तथा दक्षिण कोरिया के व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते पर निर्भर है। यही वजह है कि इसे हिंद महासागर क्षेत्र की सबसे अहम ‘चोक पॉइंट’ माना जाता है।
भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अभी तक देश के पास इस इलाके में कोई बड़ा ट्रांसशिपमेंट हब नहीं है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत का करीब 75 प्रतिशत कंटेनर ट्रांसशिपमेंट विदेशी बंदरगाहों जैसे सिंगापुर, कोलंबो और पोर्ट क्लांग के जरिए होता है। इससे न केवल समय बढ़ता है, बल्कि लॉजिस्टिक्स लागत भी 10 से 15 प्रतिशत तक ज्यादा हो जाती है। रिजर्व बैंक और शिपिंग मंत्रालय से जुड़े अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि उच्च लॉजिस्टिक लागत के कारण भारत की मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है।
इसी कमी को दूर करने के लिए ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट को गेमचेंजर बताया जा रहा है। यह परियोजना लगभग 166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली होगी। इसमें गैलेथिया बे पर अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांस शिपमेंट टर्मिनल, ड्यूल यूज सिविल-मिलिट्री एयरपोर्ट, 450 मेगावॉट का गैस और सौर ऊर्जा आधारित पावर प्लांट और एक नई इंटीग्रेटेड टाउनशिप शामिल है। सरकारी दस्तावेज बताते हैं कि सिर्फ पोर्ट परियोजना पर करीब 40,040 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। पहले चरण में 18,000 करोड़ रुपये की लागत से 2028 तक इसे चालू करने का लक्ष्य है। शुरुआती क्षमता 4 मिलियन टीईयू से अधिक होगी, जबकि पूरी तरह विकसित होने पर यह क्षमता 16 मिलियन टीईयू तक पहुंच सकती है।
अगर इन आंकड़ों की तुलना की जाए तो भारत का कुल कंटेनर ट्रैफिक 2020 में करीब 17 मिलियन टीईयू था, जबकि चीन का आंकड़ा 245 मिलियन टीईयू से अधिक रहा। यह अंतर साफ दिखाता है कि भारत को अपने समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर में कितनी बड़ी छलांग की जरूरत है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बड़े कंटेनर जहाज सीधे ग्रेट निकोबार पर रुकने लगते हैं, तो छोटे फीडर जहाजों के जरिए देश के पूर्वी और पश्चिमी तट के बंदरगाहों तक माल पहुंचाना आसान होगा। इससे ट्रांजिट टाइम में कई दिन की बचत हो सकती है और लागत में भी उल्लेखनीय कमी आएगी।
रणनीतिक दृष्टि से यह परियोजना भारत की समुद्री सुरक्षा को नई मजबूती दे सकती है। रक्षा विश्लेषकों के अनुसार ग्रेट निकोबार का विकास हिंद महासागर क्षेत्र में निगरानी, खुफिया गतिविधियों और त्वरित सैन्य प्रतिक्रिया की क्षमता को बढ़ाएगा। आपदा प्रबंधन और मानवीय सहायता अभियानों के लिहाज से भी यह द्वीप एक अहम बेस बन सकता है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती सामरिक हलचलों के बीच भारत के लिए यह एक अतिरिक्त बढ़त के रूप में देखा जा रहा है।
लेकिन जितनी बड़ी इसकी रणनीतिक और आर्थिक अहमियत है, उतनी ही गहरी इसकी पर्यावरणीय चुनौतियां भी हैं। ग्रेट निकोबार एक बायोस्फीयर रिजर्व है, जहां घने वर्षावन, मैंग्रोव, कोरल रीफ और कई दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं। पर्यावरण आकलनों के मुताबिक परियोजना के लिए 8.5 लाख से लेकर 50 लाख से ज्यादा पेड़ों की कटाई की आशंका जताई गई है। यह इलाका लेदरबैक समुद्री कछुओं के सबसे महत्वपूर्ण प्रजनन स्थलों में से एक है।
इसके अलावा निकोबार मेगापोड पक्षी, खारे पानी के मगरमच्छ, निकोबार मकाक और रॉबर क्रैब जैसी प्रजातियों पर भी खतरे की बात कही जा रही है यही वजह है कि इस परियोजना को लेकर राजनीतिक और सामाजिक विरोध भी सामने आया। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी समेत कई पर्यावरणविदों ने आरोप लगाया कि परियोजना में पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के भविष्य को नजरअंदाज किया गया है। उनका कहना रहा कि क्लाइमेट चेंज के दौर में समुद्र स्तर बढ़ रहा है और ऐसे में इतने बड़े तटीय इंफ्रास्ट्रक्चर का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
ग्रेट निकोबार सिर्फ जैव विविधता का केंद्र नहीं है, बल्कि शोंपेन और निकोबारी जैसी जनजातियों का भी घर है। खासतौर पर शोंपेन जनजाति की आबादी 200 से 300 के बीच बताई जाती है और उन्हें दुनिया की सबसे संवेदनशील आदिवासी जनजातियों में गिना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े पैमाने पर बाहरी आबादी के आने से उनकी पारंपरिक जीवन शैली, संस्कृति और अस्तित्व पर गंभीर असर पड़ सकता है। सरकार का दावा है कि आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं और उनके क्षेत्रों में न्यूनतम हस्तक्षेप होगा, लेकिन इस पर लगातार निगरानी की मांग की जा रही है।एनजीटी ने अपने आदेश में पर्यावरण संरक्षण को लेकर कई सख्त निर्देश दिए हैं।
इनमें मैंग्रोव पुनर्स्थापन, कोरल ट्रांसलोकेशन, तटरेखा संरक्षण, वन्य जीवों के प्रजनन स्थलों की सुरक्षा और आदिवासी हितों की रक्षा शामिल है। ट्रिब्यूनल ने यह भी साफ किया है कि आईलैंड कोस्टल रेगुलेशन जोन नियमों का किसी भी स्तर पर उल्लंघन स्वीकार नहीं किया जाएगा और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई की जाएगी। कुल मिलाकर, ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट भारत के सामने एक बड़ी परीक्षा है। एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री शक्ति और आर्थिक विकास की जरूरत है, तो दूसरी तरफ पर्यावरण संतुलन और स्थानीय समुदायों की रक्षा की जिम्मेदारी। आने वाले वर्षों में यह परियोजना किस दिशा में आगे बढ़ती है, यही तय करेगा कि ग्रेट निकोबार भारत के लिए अगला सिंगापुर बनता है या विकास और संरक्षण की टकराहट का सबसे बड़ा उदाहरण। फिलहाल इतना तय है कि यह द्वीप अब सिर्फ भारत का सबसे दक्षिणी भूभाग नहीं, बल्कि देश की समुद्री राजनीति और दीर्घकालिक रणनीति का केंद्र बन चुका है।
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