Saturday, February 28, 2026
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आजमगढ़ में क्यों दिखी मिमियाहट

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डॉ0 अम्बरीष राय

महाराजा सुहेलदेव की स्क्रिप्ट उस समय लिखी गई जब ओमप्रकाश राजभर ने भाजपा से फिर इश्क़ के सिलसिले नामंजूर कर दिए. कहने को तो सपा के गढ़ में अमित शाह गरज रहे थे लेकिन उनकी मिमियाहट हम जैसों को ख़ास तौर पर दिख रही थी. मौका था उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय के शिलान्यास का, जगह थी आज़मगढ़. वही आज़मगढ़, जहां की मिट्टी ने मेरी संपूर्णता को आकार दिया है. सप्त ऋषियों के आध्यात्मिक मंडल के चार ऋषियों की तपोस्थली रहा आज़मगढ़ मां सरस्वती के आराधकों की धरती रही है. अमित शाह जैसे कमअक्ल पेशेवर राजनेताओं को ये बताना ज़रूरी है कि चंद्रमा, दुर्वासा, दत्तात्रेय, देवल जैसे ऋषि साधकों की धरती को सरस्वती धाम बनाने के लिए उनके जैसे कृत्रिम लोगों की ज़रूरत नहीं है.

महापुरुषों को हाईजैक करने के इस सियासी दौर में ये जान लेना ज़रूरी है कि ओमप्रकाश राजभर राजभरों के नेता हैं. महाराजा सुहेलदेव, बस सुहेलदेव नहीं हैं. वो सुहेलदेव राजभर हैं. चुनावों में जा रहे उत्तर प्रदेश में राजभर जातीय अस्मिता के नाम पर ओमप्रकाश राजभर के नेतृत्व में लामबंद हैं. ये लामबंदी भाजपा के साथ नहीं बल्कि उसके खिलाफ़ है. ये लामबंदी उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े खिलाड़ी अखिलेश यादव के साथ है. और चुनावी आहट में भाजपा बस बेबस. बेबसी के इसी आलम में राजभराना सी है भाजपा की अदा.. राजभरों! भाजपा को गुनगुना लीजिये.. के तराने गूंजने लगे हैं.

एक लंबे समय तक उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक सिविल अधिकारियों को पैदा करने वाला आज़मगढ़ मां सरस्वती का धाम है, मुझे कहने में ये बिल्कुल संकोच नहीं है, तथ्यों की भरमार आज़मगढ़ की साहित्यिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, आध्यात्मिक, धार्मिक परम्परा का पुरज़ोर समर्थन करती है. गंगा में बहती लाशों के अक्षम्य अपराध के साये में खड़ी सरकार झूठ की नई खेप लेकर आई है. भाजपा के चाणक्य माने जाने वाले ( हालांकि मैं इसे चाणक्य का अपमान मानता हूं ) अमित शाह अपने चुनावी प्रबंधन के चलते खासे चर्चित हैं. अमित शाह ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने की कमान सम्हाल ली है. उनकी रणनीति रही है कि नए बने वोटरों को भाजपा से जोड़ा जाए. और उन वोटों से सत्ता का वातानुकूलन हासिल किया जाए. भगवा ब्रिगेड की वाट्सअप यूनिवर्सिटी झूठे तत्वों और तथ्यों की स्थापना के लिए जानी जाती है. यहां सच के अलावा सब कुछ परोसा और पढ़ाया जाता है. और नौजवानों की एक बड़ी खेप इस विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से मुतासिर है. इतिहास के पुनर्लेखन की मांग और इच्छा के इस दौर में स्थापित सत्यों को बदलने की कोशिश की जा रही है. सच का हर पौधा झूठ के बरगद के नीचे कुचला जा रहा है.

इसी वाट्सअप विश्वविद्यालय के तथाकथित कुलपति जब एक असली विश्वविद्यालय की आधारशिला रखने गए तो अपने साथ अपने विश्वविद्यालय का ज्ञान भी ले गए. आज़मगढ़ में तेज आवाज़ में झूठ बो रहे अमितशाह ने राम रावण युद्ध के दौरान रावण के सुशासन की चर्चा की. शाह ने जोड़ा कि राम ने भरत को मृत्युशैय्या पर पड़े रावण से सुशासन की सीख लेने को कहा. अब भरत तो राम का खड़ाऊं लेकर अयोध्या में राजपाट चला रहे थे, लेकिन सच को नए सिरे से स्थापित करने की कोशिशों को इस झूठ से कहां फ़र्क पड़ता है. और क़िताबों से लगातार भागती भारतीय तरुणाई जब अपने सेलफोन में पोर्न और परंपरा एक साथ पढ़ेगी तो नई क़िताबों के सेलेबस तय करने वाले इन महारथियों की सत्तात्मक सनक सिर चढ़कर बोलती रहेगी. लोग झूठ पढ़ेंगे तो सच का गला घोंटेगे, सत्यार्थियों को झूठा समझेंगे. ख़ैर जिस आज़मगढ़ की धरती पर शाह झूठ की नव स्थापना कर रहे थे, उनको मालूम नहीं कि वो धरती अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, राहुल सांकृत्यायन, श्याम नारायण पांडेय, चन्द्रबली पांडेय, अल्लामा शिब्ली नोमानी, कैफी आज़मी जैसी विभूतियों की है.

ख़ैर आतंकी वज़हों से आज़मगढ़ को बदनाम करने के पीछे क्या साजिश थी, क्या सच्चाई है, ये अभी तय नहीं हुआ है. लेकिन बदनाम करने में सबसे ज़्यादा अमित शाह & कंपनी का हाथ है. बिना न्यायालय का फैसला आए जो लोग आज़मगढ़ को आतंकगढ़ कहने लगते हैं, उनको एक तड़ीपार को तड़ीपार कहने में गला सूखने लगता है. मैं व्यक्तिगत तौर पर न्यायालय के निर्णयों के इंतज़ार करने का हिमायती हूं. लेकिन आप दोहरा स्टैंड लेकर नहीं चल सकते. आपराधिक मामलों में जेल पुलिस खेलने वाले अमित शाह और अजय मिश्र टेनी, आज़कल भारत के गृहमंत्री और गृहराज्यमंत्री हैं. माननीय हैं. तो फिर आज़मगढ़ भी सरस्वती धाम था.. है..और रहेगा.. बाक़ी राजभर का भूत इनको आगे भी बहुत सताएगा. और लाज़िम है हम भी देखेंगे.