Friday, February 27, 2026
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आत्मनिरीक्षण क्या है ..?

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प्रत्येक मनुष्य का यह नैतिक कर्तव्य है कि वह स्वयं का निरीक्षण करे. खूबियों के साथ खामियों की संभावनाओं को भी नकारा नहीं जा सकता, बावजूद इसके हमें हमारे नैतिक मूल्यों के अनुरूप सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिए. अतः जरूरत इस बात की है कि हम अपने अन्दर की बुराईयों की पहचान कर उसे दूर करें और एक स्वस्थ सामाजिक वातावरण के निर्माण में सहयोग दें.

आत्म-निरीक्षण शब्द में आत्म का अर्थ है- स्वयं और निरीक्षण से अभिप्राय है- जांच करना. अर्थात आत्म- निरीक्षण से मतलब स्वयं के जांच से है. यह जांच अर्थात निरीक्षण भी हमें स्वयं ही करना है; पूरी ईमानदारी से और हमारे सामाजिक-नैतिक मूल्यों की कसौटी पर. यह आवश्यक है कि हम हमारे अन्दर के सदगुणों और अवगुणों की पड़ताल करें.

आत्मनिरीक्षण क्या है ? आत्मनिरीक्षण करने से लाभ क्या है ? इस पर हम आज विचार करते है.’आत्म’ का अर्थ होता है खुद अपनेआप का, स्वयं का, अपने मन का, अपनी बुद्धि का, अपनी इंद्रिओ का, अपने विचारो का, अपनी चेष्टाओं का, अपने क्रियाकलापों का, अपने संस्कारो का’निरिक्षण’ करना अर्थात् ‘नितराम इक्षणम्’ देखना. ये सभी को नित्यप्रति, प्रति घंटे, प्रति मिनट, हमेशा गंभीरता से देखने में प्रवृत्त होना ‘आत्मनिरीक्षण’ है.अपनी आत्मा की प्रेरणा से मनुष्य अपने मन-वाणी और शरीर द्वारा किए गए प्रयत्नविशेष को जो देखता है, जानता है, समजता है उसे ‘आत्मनिरीक्षण’ कहते है.

नैतिकता को विभिन्न विद्वानों ने कुछ इस तरह परिभाषित किया है:-

जिसबर्ट कहते हैं कि नैतिक नियम नियमों की वह व्यवस्था है जिसका सम्बन्ध अच्छाई और बुराई से है. प्रो. कूपर के अनुसार, नैतिकता व्यवहार के कुछ नियमों से संबंधित है जिसका उल्लंघन करने पर व्यक्ति का अन्त:करण (अन्तरात्मा) उसे धिक्कारता है. यह सत्य है कि नैतिकता की प्रवृत्ति परिवर्तनशील है जो देश और काल के अनुसार बदलता रहता है. किसी समाज को जो सहज स्वीकार्य है, वह नैतिक है. इस प्रकार, इसका सम्बन्ध सामाजिक मूल्यों से है.

भारतीय संस्कृति विश्व की अप्रतिम संस्कृति है. प्राचीनकाल से ही हमारी संस्कृति विश्व में हमें अलग पहचान दिलाती रही है. हमारी संस्कृति में नैतिकता की अवधारणा में जिन गुणों को स्थान दिया गया है, उसका आधार ‘पवित्रता, न्याय और सत्य’ है. मानवीय एकता, मानवोत्थान, सहयोग की भावना, सत्य एवं न्याय पर विश्वास, अहिंसा, सच्चरित्रता, उदारता, सहानुभूति व संवेदना आदि सदगुण हमारे स्थापित सामाजिक व नैतिक आर्दश हैं. इन्हीं सदगुणों के आधार पर मनुष्य का जीवन सार्थक है और वह अन्य जीवों में श्रेष्ठ है.

यदि इन सदगुणों के आलोक में हम अपनी अन्तरात्मा की आवाज को सुनें, तो हमें यह सहज ही भान हो जाता है कि क्या अनुचित है अथवा क्या उचित. हमें क्या करना चाहिए अथवा क्या नहीं करना चाहिए. महान मौर्य शासक अशोक कलिंग युद्ध में हुए रक्तपात से इस कदर द्रवित हो उठा कि उसने फिर कभी हिंसा न करने की ठान ली.

यह उसके अन्तरात्मा की आवाज ही थी जिसने उसे ऐसा करने के लिए प्रेरित किया. चौरी-चौरा की घटना (1922) के बाद गाँधीजी ने अपनी अन्तरात्मा की आवाज को सुनकर ही असहयोग आन्दोलन को स्थगित कर दिया था. भर्तृहरि ‘नीतिशतक’ में कहते हैं कि जिस मनुष्य के पास न तो विद्या है न गुण, धर्म और नीतिसम्मत आचरण, वह मनुष्य पृथ्वी पर बोझ के समान है.

आज हमारी प्राचीन संस्कृति यदि दूषित हो रही है; हत्या, लूट-पाट, बलात्कार आदि कुकृत्य हो रहे हैं तो यह आवश्यक है कि हम आत्म-निरीक्षण करें व सदैव अपनी सांस्कृतिक धरोहर के रक्षार्थ प्रयत्नशील रहें.