Tuesday, February 10, 2026
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वर्दी का सौदा: जब कानून ब्लैकमेल की भाषा बोलने लगे

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वर्दी का सौदा: जब कानून ब्लैकमेल की भाषा बोलने लगे
वर्दी का सौदा: जब कानून ब्लैकमेल की भाषा बोलने लगे
डॉ.प्रियंका सौरभ
      डॉ.प्रियंका सौरभ
वर्दी का सौदा: जब कानून ब्लैकमेल की भाषा बोलने लगे,वर्दी, जो कानून और सुरक्षा की पहचान होती है… जब उसी वर्दी का सौदा होने लगे, जब न्याय की जगह डर और ब्लैकमेल की भाषा बोलने लगे—तो सवाल सिर्फ़ एक नहीं, पूरे सिस्टम पर खड़ा होता है। क्या कानून अब इंसाफ़ नहीं, सौदेबाज़ी का औज़ार बनता जा रहा है? आज की इस रिपोर्ट में हम उसी कड़वी सच्चाई को सामने रखने जा रहे हैं। एफआईआर न्याय पाने का दस्तावेज़ कम और डराने का औज़ार ज़्यादा है।
हरियाणा पुलिस की एक महिला इंस्पेक्टर का निलंबन महज़ एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह उस सड़ांध की ओर इशारा करता है जो वर्दी के भीतर चुपचाप फैल रही है। आरोप है कि एक कॉलोनाइज़र को तंत्र-विद्या के जाल में फँसाकर, एफआईआर रद्द कराने के बदले शारीरिक संबंध बनाए गए और बाद में डर व ब्लैकमेल के सहारे एक लाख रुपये की “मंथली” माँगी गई। यदि ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला केवल व्यक्तिगत नैतिकता या चरित्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे आपराधिक न्याय तंत्र की विश्वसनीयता पर गहरा सवाल खड़ा करता है।
यह घटना इसलिए भी अधिक खतरनाक है क्योंकि इसमें तीन ताकतवर हथियार एक साथ इस्तेमाल हुए—वर्दी की सत्ता, अंधविश्वास का भय और कानून का डर। भारत में तंत्र-मंत्र, टोना-टोटका और अंधविश्वास आज भी केवल अशिक्षा या पिछड़ेपन का प्रतीक नहीं हैं। बड़े शहरों, पढ़े-लिखे समाज और आर्थिक रूप से सक्षम वर्ग में भी डर के क्षणों में विवेक कमजोर पड़ जाता है। जब इस डर को कोई वर्दीधारी अधिकारी अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करे, तो पीड़ित व्यक्ति मानसिक, सामाजिक और कानूनी रूप से पूरी तरह असहाय हो जाता है।
यह मान लेना भूल होगी कि यह कोई अकेला या अपवादात्मक मामला है। देश के अलग-अलग हिस्सों से समय-समय पर पुलिस और प्रभावशाली तंत्रों की साँठ-गाँठ के मामले सामने आते रहे हैं। कहीं जमीन विवाद में केस दर्ज करने की धमकी देकर पैसे वसूले जाते हैं, कहीं रेप या धोखाधड़ी के मामलों में “सेटिंग” के नाम पर सौदेबाज़ी होती है। कई बार आरोपी और फरियादी दोनों ही थाने के चक्कर काटते हैं, यह जानते हुए कि न्याय नहीं, समझौता ही अंतिम रास्ता है।
इस मामले में एक अहम बात यह भी है कि आरोप एक महिला अधिकारी पर हैं। समाज अक्सर यहीं आकर भटक जाता है। बहस अपराध की बजाय महिला-पुरुष, नैतिकता और चरित्र पर केंद्रित हो जाती है। लेकिन सवाल यह नहीं है कि आरोपी महिला है या पुरुष। सवाल यह है कि क्या वर्दी पहनते ही कोई व्यक्ति कानून से ऊपर हो जाता है? कानून का तकाज़ा यह नहीं कि हम आरोपी के लिंग पर बहस करें, बल्कि यह है कि सत्ता के दुरुपयोग को बिना किसी संकोच के बेनकाब किया जाए।
कानून के सामने लिंग, जाति, पद या प्रभाव नहीं—सिर्फ़ अपराध मायने रखता है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह अपराध सिर्फ़ ब्लैकमेल या भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि न्याय की अवधारणा पर सीधा हमला है। यह उस भरोसे का कत्ल है, जो आम नागरिक पुलिस और प्रशासन पर करता है।
आज एफआईआर आम आदमी के लिए सुरक्षा की गारंटी कम और डर का प्रतीक ज़्यादा बनती जा रही है। एक काग़ज़, कुछ धाराएँ और कुछ हस्ताक्षर—और पूरा जीवन शक, बदनामी और भय में बदल जाता है। नौकरी खतरे में पड़ जाती है, सामाजिक प्रतिष्ठा धूमिल हो जाती है और परिवार मानसिक दबाव में आ जाता है। जब इसी डर को सौदे की शक्ल दे दी जाती है, तब कानून न्याय का माध्यम नहीं, बल्कि बाज़ारू हथियार बन जाता है।
इस मामले में एक लाख रुपये की मंथली माँग यह साफ़ करती है कि यह कोई भावनात्मक या क्षणिक चूक नहीं थी, बल्कि सुनियोजित वसूली का तंत्र था। भारत में ऐसे ‘मंथली सिस्टम’ किसी से छिपे नहीं हैं। अवैध शराब, खनन माफिया, कॉलोनाइज़र, सट्टा-जुआ—हर जगह एक तय रेट, एक तय तारीख और यह भरोसा कि “सब मैनेज है।” अगर आरोप सही हैं, तो यह मानना कठिन है कि यह सब एक व्यक्ति के बूते पर हो रहा था। असली परीक्षा इस बात की है कि जाँच कितनी निष्पक्ष, कितनी गहरी और कितनी ईमानदार होती है।
दुर्भाग्य से, ऐसे मामलों में निलंबन को ही सबसे बड़ी कार्रवाई बताकर पेश कर दिया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि निलंबन कोई सज़ा नहीं, बल्कि सिर्फ़ एक अस्थायी विराम है। कई बार जांच लंबी चलती है, सबूत कमजोर पड़ते हैं और मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। ज़रूरत इस बात की है कि जाँच समयबद्ध हो, कॉल डिटेल्स, बैंक लेनदेन, संपत्ति और संपर्कों की पूरी पड़ताल की जाए और दोष सिद्ध होने पर बर्खास्तगी के साथ आपराधिक मुकदमा भी चले।
यह मामला केवल पुलिस सुधार या प्रशासनिक जवाबदेही तक सीमित नहीं है। यह समाज को भी आईना दिखाता है। जब हम अंधविश्वास को पालते हैं, जब हम डर के आगे विवेक गिरवी रख देते हैं और जब हम “किसी तरह बच निकलने” की मानसिकता को सामान्य मान लेते हैं, तब ऐसे सौदे पनपते हैं। कानून तभी मज़बूत होगा, जब नागरिक डर के बजाय अधिकार की भाषा बोलना सीखेंगे।
आज डर एक कॉलोनाइज़र को था। कल यह डर किसी शिक्षक, किसी कर्मचारी, किसी छोटे व्यापारी या किसी आम नागरिक को हो सकता है। अगर कानून के रक्षक ही डर का व्यापार करने लगें, तो समाज न्याय नहीं, समझौते खोजने लगता है। यह स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है।
यह मामला चेतावनी है कि वर्दी जितनी ऊँची होती है, जवाबदेही उतनी ही भारी होनी चाहिए। वर्दी सम्मान का प्रतीक है, सौदेबाज़ी का लाइसेंस नहीं। अगर समय रहते ऐसे मामलों पर सख़्ती नहीं हुई, तो वह दिन दूर नहीं जब थानों में कानून की भाषा नहीं, बल्कि ब्लैकमेल की बोली आम हो जाएगी। और तब सवाल यह नहीं रहेगा कि दोषी कौन है, बल्कि यह होगा कि क्या इस देश में सचमुच न्याय नाम की कोई चीज़ बची है?