

जब देष में आजादी की जंग लड़ी जा रही थी तभी सोषल जस्टिस की आवाज भी बुलंद हो रही थी। इस लड़ाई में एक ओर महात्मा गांधी थे तो दूसरी ओर डॉक्टर भीमराव आंबेडकर थे। डॉ0 आंबेडकर को कांग्रेस की रहनुमाई में चलने वाली आजादी की लड़ाई में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वे मानते थे कि अंग्रेज गए तो कांग्रेस राज में दलितों पर फिर सवर्णो का राज हो जाएगा। वे कहते थे कि अंग्रेज राज में एक जैसे कानून और एक षासन की षुरूआत हुई है। कांग्रेस दलितों को देष की राजनीति में उनकी सही जगह और समान अधिकार नहीं देना चाहती है। डॉ0 आंबेडकर ने सुधारवादी रवैया न अपनाकर नाइंसाफी, नस्ल और जाति के नाम पर भेदभाव के खिलाफ जंग को हथियार बनाया। गांधी जी और कांग्रेस के साथ डॉ0 आंबेडकर के रिष्ते षुरू में बहुत तल्ख रहे। जब-जब वे चुनाव लड़े कांग्रेस ने उन्हें हराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनको हिन्दू विरोधी और आजादी के खिलाफ, अंग्रेजों का हमदर्द बताकर बदनाम किया गया। डॉ0 साहब भी अपने लोगों से कहते थे कि अपनी सुरक्षा का सबसे अच्छा रास्ता यही है कि गांधीजी से सावधान रहो। उनके अनषन को वे ढकोसला बताते थे। कहते थे गांधीजी के षब्द झूठ और फरेब से भरे होते हैं।
डॉ. आंबेडकर के कांग्रेस से दूर रहने के पीछे क्या था, यह समझने की जरूरत है। सरदार बल्लभ भाई पटेल को 14 अक्टूबर 1946 में लिखे एक पत्र में डॉ0 साहब ने पूछा क्या मिस्टर गांधी आपको देष से भी ज्यादा बड़े लगते है? आपको हमेषा यही लगता है कि जो आदमी राश्ट्रवादी है वह कांग्रेसवाला ही होना चाहिए जबकि मेरा मानना है कि कांग्रेसवाला न होने वाला भी नेषनलिस्ट होता है। मैं किसी से भी ज्यादा नेषनलिस्ट हॅू। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर अपने दलित भाइयों को बराबर समझाते थे कि वे षिक्षित हो, संगठित हों और संघर्श करे। इसलिए वे अपने लोगों को जगाने के काम को तरजीह देते थे। गांधी जी छुआछूत को पाप मानते थे लेकिन आंबेडकर जी उसे ऐसी बीमारी मानते थे जिससे समाज में सडांध पैदा हो गई है। उन्होंने जाति प्रथा पर जोरदार हमला किया। उनकी राय थी कि हिन्दुस्तानी समाज की व्यवस्था जब तक नहीं बदलेगी तब तक कोई तरक्की नहीं होगी।
डॉ. आंबेडकर यों तो षुरू से ही छुआछूत के खिलाफ झंडा उठाए हुए थे किन्तु उनका सबसे ज्यादा नाम सन्1927 में महाड़ आंदोलन से हुआ जब एक तालाब से दलितों के पानी लेने पर रोक की खिलाफत करने में उन पर हमला हुआ। सन्1930 में नासिक के कालाराम मंदिर में अछूतों के अंदर जाने के लिए आंदोलन चला। इन आंदोलनों से दलितों में नई चेतना जागी।
पहली गोलमेज कांफ्रेंस में, जो सन्1930 के जाड़ो में हुई, कांग्रेस षामिल नहीं हुई जबकि मुसलमानों, सिखों, ईसाई और अछूतों के डेलीगेषन तथा हिन्दू महासभा के मेम्बरों ने इसमें हिस्सा लिया। इस सम्मेलन में डॉ0 आंबेडकर ने कहा कि दलित वर्ग अपने आप में एक अलग वर्ग है। वह हिन्दू समाज का हिस्सा नहीं है। उन्होंने अलग से निर्वाचक मंडल की मांग की। दूसरी गोलमेज कांफ्रेंस में गांधीजी और डॉ0 आंबेडकर में और ज्यादा तल्खी नज़र आई। ब्रिटिष प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने चुनाव में दलित को अलग निर्वाचन क्षेत्र (कांस्टीच्युएंसी) भी बांट दिया। इसे कम्युनल एवार्ड कहा गया।
गांधीजी कम्युनल एवार्ड के खिलाफ थे। उनका बेबाक बयान था कि इससे हिन्दू समाज में बंटवारा हो जाएगा। उन्होंने कहा कि मैं इस अलगाव का विरोध करूंगा चाहे इसकी कीमत मुझे जान देकर ही क्यों न चुकानी पड़े। गांधीजी उस समय यरवदा जेल में बंदी थे। उन्होंने 20 सितम्बर 1932 की दोपहर से अपना अनषन षुरू कर दिया। गांधीजी के इस एलान के बाद पूरे देष में उनके समर्थन के संदेष मिलने लगे। एक तरह की इमोषनल उथलपुथल पूरे देष में सामने आने लगी। अनषन से गांधीजी की हालत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही थी। पूरा देष चिंतित था। गांधीजी के पुत्र श्री देव दास ने गांधीजी के अनषन के छठे दिन जो हालत देखी तो कहा ‘पिताजी डूब रहे हैं।‘ तब तक आंबेडकर जी भी पूना आ गए थे। वे यह मानने को तैयार नहीं थे कि उनके अलावा दलितों-अछूतों का दूसरा कोई रिप्रजेंटेटिव हो सकता है। ये महात्मा अनषन करने वाले कौन है? इन कड़वे बयानों से वहां मौजूद लोग गुस्से में आ गए। तब मद्रास से आए एक और दलित नेता एम.सी. राजा ने आंबेडकर से कहा ‘हजारों साल से हम दबे कुचले और अपमानित होते रहे हैं। गांधीजी हमारे लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं। अगर उनकी मौत होती है तो फिर अगले हजारों साल तक हम वहीं पड़े रहेंगे जहां अब तक थे। लोग यही कहेंगे कि हमने उनकी हत्या की है। हिन्दू समाज में इतना बड़ा सैलाब आएगा जो हमें और नीचे फेंक देगा। आंबेडकर जी ने तब कहा-मैं सुलह के लिए तैयार हॅू।
आखिरकार डॉ. आंबेडकर यरवदा जेल में गांधी जी से मिलने आए। गांधीजी की जान बचाने के लिए और अछूतों के हक हकूकों की सलामती के लिए डॉ0 आंबेडकर ने 24 सितम्बर 1932 को एक समझौते पर हस्ताक्षर किए जो ‘पूना पैक्ट‘ के नाम से जाना जाता है। इस समझौते पर गांधी जी ने दस्तखत नहीं किए। हिन्दू पक्ष से महामना मदन मोहन मालवीय ने इसमें पहल की। दलित नेताओं ने भी दस्तखत किए। गांधीजी ने तब 26 सितम्बर को अपना अनषन खत्म किया। पूना पैक्ट को लेकर काफी कुछ उसके पक्ष-विपक्ष में लिखा जा चुका है। एक बात तो साफतौर पर कहीं जा सकती है कि गांधीजी ने अगर अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर सवर्ण (हिन्दू समाज) पर दबाव न बनाया होता तो षायद इतनी आसानी से सामाजिक कलंक नहीं मिटता और अगर डॉ0 आंबेडकर ने लगातार राजनीतिक दबाव न बनाया होता तो षायद अछूत समाज को पार्लियामेंट, असेम्बली और दूसरे पब्लिक प्लेटफार्म तथा संस्थाओं में जगह नहीं मिलती। रिजर्वेषन भी उसी का एक नतीजा है। आंबेडकर जी ने इसलिए समझौता किया क्योंकि वे जानते थे कि गांधीजी की मौत से दलित-सवर्ण दंगे होते और समाज की खाई पाटने के प्रयासों को पलीता लग जाता।
अफसोस कि षुरूआत में भाईचारे का जो माहौल बना था वह बाद में बिगड़ता गया। डॉ0 आंबेडकर का धीरज तब जवाब देने लगा। 13 अक्टूबर 1935 को बाबा साहेब ने बेबसी में एलान किया कि गोकि वे जन्म से हिन्दू थे फिर भी मरते समय हिन्दू नहीं रहेंगे। उन्होंने धर्म बदलने का भी इरादा जताया जिस पर देष में काफी खलबली मच गई थी। गांधी जी और डॉ0 आंबेडकर के आपसी रिष्ते गरम-नरम किस्म के थे। दोनों के सामाजिक लक्ष्य तो एक थे पर रास्ते अलग-अलग थे। गांधीजी मानते थे कि डॉ0 साहेब के मन में बहुत कड़वाहट है। वैसे वे बहुत प्रतिभावान हैं। भारत के बाहर उनका बहुत सम्मान है किन्तु भारत में कदम-कदम पर यह एहसास कराया जाता है कि हिन्दू समाज में उनकी एक अछूतवाली हैसियत है। गांधीजी को समाज सुधार के आंदोलनों पर भरोसा था। वे अछूतों को हिन्दू समाज का अभिन्न अंग मानते थे। आंबेडकर जी का मत था कि जातिप्रथा श्रम विभाजन नहीं वरन श्रमिकों का विभाजन है। हिन्दू समाज और कुछ नहीं जातियों का समूह मात्र है।
यह सही है कि डॉ. भीमराव आंबेडकर कांग्रेस के स्वराज आंदोलन के हिमायती नहीं थे, अंग्रेजों के प्रति उनके मन में बहुत सहानुभूति थी, वे उन्हें उद्धारक के रूप में देखते थे लेकिन धीरे-धीरे उनके विचार बदलते गए। उन्होंने देखा अंग्रेज भी अपनी सŸा बनाए रखने के लिए रईसों, सवर्णों का सहारा ले रहे हैं। फिर भी वे दूसरे वर्ल्डवार में अंग्रेजों के साथ खड़े दिखाई दिए। उन्होंने 1942 में गांधीजी के भारत छोड़ो आंदोलन का भी विरोध किया। साल भर बाद आंबेडकर जी को वायसराय की कार्यकारिणी में षामिल कर लिया गया। बाद में हालत कुछ ऐसे बदले कि अंग्रेजों ने उन्हें हाषिये पर रखा और वे खुद भी अंग्रेजों से दूर हो गए। देष आजाद हुआ। पहली नेहरू सरकार में डॉ0 आंबेडकर को कानूनमंत्री बनाया गया। उन्होंने भी कांग्रेस के लिए अपनी नापसंदगी छोड़ दी। वे संविधानसभा में बंबई से चुनकर आए। नेहरू-पटेल की राय से इतर गांधीजी के परामर्ष पर संविधानसभा में उन्हें ड्राफ्टिंग कमेटी का अध्यक्ष बना दिया गया। संविधान निर्माण में उनकी भूमिका काबिले तारीफ रही। उन्हें संविधान निर्माता की पदवी दी गई।
संविधानसभा में उन्होंने 15 दिसम्बर 1946 को दिए गए अपने भाशण में कहा कि आज हम लोग पोलिटिकल, एकोनामिक तथा सोषल दायरे में अलग-अलग खेमे में हैं। इसके बावजूद कोई ताकत इस देष की एकता को नहीं तोड़ पाएगी। उनका यह भी कहना था कि पोलिटकल डेमोक्रेसी अगर सोषल डेमोक्रेसी के साथ नहीं चलेगी तो डेमोक्रेसी का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। नेहरू मंत्रिमंडल में डॉ0 आंबेडकर अपनी मन पसंद मिनिस्ट्री नहीं मिलने से नाराज थे। कई पॉलिसी मैटर में भी पीएम नेहरू से वे अलग राय रखते थे। हिन्दू कोड बिल पर नेहरू जी के रवैये से नाराजगी में उन्होंने इस्तीफा तक दे दिया। वे मानते थे कि देष की तेजी से तरक्की स्टेट सोषलिज्म के जरिए ही हो सकती है।
डॉ. भीमराव आंबेडकर को जिंदगी भर इस बात का मलाल रहा कि उनको कभी भी सही ढंग से समझा नहीं गया। तीस के दषक के आखिरी सालों से पचास के दषक तक डॉ. आंबेडकर दलित समाज के हालात सुधारने की लड़ाई लड़ते रहे। चुनावी राजनीति में उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिली तो क्षुब्ध होकर उन्होंने हिन्दू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाने का एलान करने के साथ 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में कई लाख दलितों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया। बहुत ज्यादा मेहनत करने से वे काफी कमजोर हो चले थे, कई बीमारियों ने उन्हें घेर लिया था। घरेलू झगड़े उन्हें परेषान किए थे, फाइनेन्षियल दिक्कतें भी बढ़ रही थीं और सबसे ज्यादा अपने ही लोगों के व्यवहार से वे बहुत ज्यादा दुःखी हो चले थे। किस्मत का खेल देखिए कि दलितों को सिक्योरिटी और इज्जत दिलाने के लिए तमाम उपेक्षाओं को सहने वाला यह महापुरूश अपने आखिरी वक्त में भी पूरी तरह अकेला था। 6 दिसम्बर 1956 को वे इस दुनिया को छोड़ गए।























