Friday, February 20, 2026
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संयम:चरित्र की कसौटी और सफलता की शर्त..!

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चिन्ता से चिन्तन की ओर..
चिन्ता से चिन्तन की ओर..
राजू यादव
राजू यादव

संयम चरित्र की सबसे बड़ी कसौटी है क्योंकि यह व्यक्ति को अपनी इच्छाओं, भावनाओं और आवेगों पर नियंत्रण रखने में मदद करता है, जिससे वह जीवन में संतुलन, परिपक्वता और स्थिरता प्राप्त करता है। यह सफलता की शर्त भी है क्योंकि यह निरंतरता, एकाग्रता और सही निर्णय लेने की शक्ति देता है, जो बड़े लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है और व्यक्ति को भटकाव से बचाता है। यह एक नैतिक गुण है जो व्यक्ति को अति से बचने और सही-गलत का विवेक रखने में मदद करता है, जो चरित्र निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है। यह व्यक्ति को विचलित होने से रोकता है और लक्ष्य की ओर केंद्रित रखता है, जिससे कठिन कार्य भी आसान हो जाते हैं। यह जीवन में संतुलन लाता है और तेज-तर्रार दुनिया में स्थिरता प्रदान करता है, जिससे सकारात्मकता बढ़ती है। अंततः मानसिक शांति और सच्ची समृद्धि की ओर ले जाता है। 

आज के समय में मनुष्य के पास सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन संतुलन घटा है। बोलने की आज़ादी है, पर शब्दों पर नियंत्रण नहीं। शक्ति है, पर विवेक का अभाव है। ऐसे दौर में यदि कोई गुण मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाता है, तो वह है संयम। संयम कोई कमजोरी नहीं, बल्कि परिपक्वता की पहचान है। यह वह कसौटी है, जिस पर मनुष्य का चरित्र और उसकी सोच परखी जाती है। भारतीय दर्शन ने सदियों पहले स्पष्ट कर दिया था कि — “संयमः सर्वसाधूनां भूषणं परमं स्मृतम्।” संयम सज्जनों का आभूषण है। आभूषण इसलिए, क्योंकि यह दिखावे से नहीं, आचरण से झलकता है। संयम का अर्थ इच्छाओं को कुचलना नहीं, बल्कि उन्हें दिशा देना है। क्रोध, लालच और अहंकार मनुष्य की ऊर्जा को नष्ट करते हैं, जबकि संयम उसी ऊर्जा को सही दिशा में मोड़ देता है। जो व्यक्ति अपने आवेगों का दास बन जाता है, वह परिस्थितियों का गुलाम हो जाता है; और जो संयम साध लेता है, वही परिस्थितियों को साधता है। चरित्र की कसौटी और सफलता की शर्त

आज हम देखते हैं कि रिश्ते टूट रहे हैं, संस्थाएँ बिखर रही हैं और समाज में असहिष्णुता बढ़ रही है। इसका मूल कारण असंयम है—असंयमित भाषा, असंयमित व्यवहार और असंयमित निर्णय। एक पल का क्रोध वर्षों की मेहनत पर पानी फेर देता है। एक असंयमित वक्तव्य जीवन भर का पछतावा बन जाता है। संयमी व्यक्ति कठिन समय में भी विचलित नहीं होता। वह शोर नहीं करता, बल्कि समाधान खोजता है। वह प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि निर्णय लेता है। यही कारण है कि सफलता अक्सर उन्हीं के कदम चूमती है, जो आवेश में नहीं, विवेक में जीते हैं। शास्त्रों में चेतावनी भी स्पष्ट है— “यः संयमं न जहाति दुःखसमयेऽपि दूरतः…” जो संकट में भी संयम नहीं छोड़ता, वही वास्तव में श्रेष्ठ मनुष्य है। असली परीक्षा सुख में नहीं, संकट में होती है। संयम मनुष्य को मानसिक रूप से स्वतंत्र बनाता है। वह दूसरों की बातों से संचालित नहीं होता, न ही छोटी-छोटी बातों पर बिखरता है। उसकी वाणी मर्यादित होती है, व्यवहार संतुलित और दृष्टि व्यापक। ऐसे लोग न केवल स्वयं शांत रहते हैं, बल्कि अपने आसपास भी स्थिरता पैदा करते हैं।

आज का समय तेज़ है, प्रतिस्पर्धा तीखी है और तनाव हर कदम पर है। ऐसे में संयम विलासिता नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुका है। बिना संयम के न तो नेतृत्व टिक सकता है, न रिश्ते, न ही समाज। मनुष्य जीवन को सुचारु, सार्थक और सुखद बनाने के लिए अनेक गुणों की आवश्यकता होती है—सत्यनिष्ठा, करुणा, संवेदनशीलता, आत्मनियंत्रण, धैर्य, परिश्रम, अनुशासन, कृतज्ञता, विनम्रता और सकारात्मक सोच। किंतु इन सभी गुणों में संयम को सर्वोत्तम और सर्वाधिक प्रभावशाली माना गया है। संयम वह आधार है, जिस पर व्यक्तित्व की पूरी इमारत खड़ी होती है। संयम केवल एक नैतिक गुण नहीं, बल्कि सफल, संतुलित और सुखी जीवन की कुंजी है। संयम त्याग नहीं, शक्ति है। मौन कायरता नहीं, बुद्धिमत्ता है। धैर्य कमजोरी नहीं, दीर्घकालिक विजय का सूत्र है। जो व्यक्ति संयम को अपने जीवन का अनुशासन बना लेता है, वही स्थायी सफलता और सच्चे सम्मान का अधिकारी बनता है। वास्तव में, संयम ही मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण है—जो न समय से टूटता है, न परिस्थितियों से धूमिल होता है। चरित्र की कसौटी और सफलता की शर्त