Wednesday, February 25, 2026
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अमेरिका-वेनेज़ुएला टकराव की शुरुआत

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अमेरिका-वेनेज़ुएला टकराव की शुरुआत
अमेरिका-वेनेज़ुएला टकराव की शुरुआत

अमेरिका की ओर से वेनेज़ुएला में की गई सैन्य कार्रवाई ने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया। ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ के तहत अमेरिकी बलों ने राजधानी काराकस सहित कई ठिकानों पर हवाई और सैन्य हमले किए और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो तथा उनकी पत्नी को हिरासत में लेकर अमेरिका ले जाने का दावा किया। इस कदम के बाद वेनेज़ुएला ने इसे अपनी संप्रभुता पर हमला बताते हुए आपात स्थिति घोषित कर दी, जबकि संयुक्त राष्ट्र और कई देशों ने गंभीर चिंता जताई है। यह घटना अब एक बड़े अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक और सैन्य विवाद का रूप ले चुकी है। अमेरिका-वेनेज़ुएला टकराव की शुरुआत

हाल ही में 3 जनवरी 2026 को अमेरिका ने वेनेज़ुएला में एक बड़ा सैन्य अभियान चलाया। जिसमें अमेरिकी बलों ने राजधानी काराकस समेत कई जगहों पर हवाई और सैन्य हमले किए और वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़ कर अमेरिका ले जाने का दावा किया है। इससे अमेरिका और वेनेज़ुएला के बीच भारी तनाव पैदा हो गया है और वेनेज़ुएला ने संयुक्त राज्य पर सैन्य आक्रमण का आरोप लगाते हुए आपात स्थिति घोषित कर दी है। अमेरिका का कहना है कि यह ऑपरेशन ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ नाम से हुआ और मादुरो को नशीले पदार्थ तस्करी सहित कई आरोपों के तहत न्यूयॉर्क में अमेरिकी न्यायालय के सामने पेश किया जाएगा। यहां पाठकों को बताता चलूं कि अमेरिका की इस कार्रवाई के बाद संयुक्त राष्ट्र और कई देशों ने चिंता और आलोचना व्यक्त की है, जबकि कुछ वेनेज़ुएला-वासी जो अमेरिका में रहते हैं, उन्होंने अमेरिकी कार्रवाई का समर्थन किया है। इस तरह यह मामला अब एक कूटनीतिक और सैन्य विवाद का रूप ले चुका है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बहस और प्रतिक्रिया जारी है।

बहरहाल, गौरतलब है कि अमेरिका और वेनेजुएला के बीच लंबे समय से राजनीतिक और कूटनीतिक तनाव चला आ रहा है, जो अब सैन्य कार्रवाई तक पहुंच गया है। वास्तव में यह ठीक नहीं है। वास्तव में अमेरिका द्वारा वेनेजुएला पर हवाई हमला कर वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में लेकर देश से बाहर भेज देना तथा अमेरिका द्वारा इस कार्रवाई का कारण नशीले पदार्थों की तस्करी और उससे जुड़े तथाकथित “नार्को-आतंकवाद” को बताने पर कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं। पहला सवाल तो यह कि अगर नशीले पदार्थों की तस्करी की समस्या है, तो क्या उसका समाधान किसी संप्रभु देश पर सीधा हमला करना हो सकता है?

अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, किसी भी देश के खिलाफ सैन्य कार्रवाई आखिरी विकल्प मानी जाती है। उससे पहले बातचीत, कूटनीति, प्रतिबंध या अंतरराष्ट्रीय न्यायालय जैसे रास्ते अपनाए जाते हैं। वेनेजुएला ने हाल ही में बातचीत के लिए सहमति भी जताई थी, ऐसे में अमेरिका का अचानक हमला करना कहीं न कहीं संदेह पैदा करता है। दूसरा, अमेरिका का इतिहास इस तरह के आरोपों को लेकर विवादित रहा है। गौरतलब है कि इराक पर भी रासायनिक हथियारों का आरोप लगाकर हमला किया गया, लेकिन बाद में ऐसे हथियारों के ठोस सबूत सामने नहीं आए। इसलिए जब अमेरिका किसी देश पर आरोप लगाकर हमला करता है, तो उसकी नीयत और मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। तीसरा पहलू अमेरिका के दोहरे रवैये का है। एक ओर उसके राष्ट्रपति दुनिया में शांति स्थापित करने, युद्ध रुकवाने और नोबेल शांति पुरस्कार की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर एक कमजोर और संकटग्रस्त देश पर हमला किया जाता है। यह विरोधाभास अमेरिका की नैतिक विश्वसनीयता को कमजोर करता है।

इसके अलावा, कई विश्लेषक मानते हैं कि इस कार्रवाई के पीछे असली कारण वेनेजुएला की राजनीति और उसके विशाल तेल भंडार हो सकते हैं। उल्लेखनीय है कि वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देशों में से एक है। राष्ट्रपति मादुरो पहले ही आशंका जता चुके हैं कि अमेरिका वहां सत्ता परिवर्तन कर अपने हितों को साधना चाहता है। अंत में निष्कर्ष रूप में, यह बात कही जा सकती है कि यह मामला केवल नशीले पदार्थों की तस्करी का नहीं दिखता, बल्कि शक्ति प्रदर्शन, संसाधनों पर नियंत्रण और वैश्विक राजनीति का हिस्सा लगता है। इसलिए अमेरिका की इस कार्रवाई को न्यायसंगत कम और दोहरे मानदंडों वाली अधिक माना जा रहा है। अमेरिका-वेनेज़ुएला टकराव की शुरुआत