केन्द्र से टकराने की सतही राजनीति

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केन्द्र से टकराने की सतही राजनीति
केन्द्र से टकराने की सतही राजनीति
हृदयनारायण दीक्षित
हृदयनारायण दीक्षित

पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने संवैधानिक संकट पैदा कर दिया है। वे केन्द्रीय जांच एजेंसियों से भिड़ रही हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने यहां तृणमूल कांग्रेस के रणनीतिकार के आवास व कार्यालय पर छापा मारा। बताया गया कि एक घोटाले की जांच के लिए यह कार्यवाही की गई है, लेकिन जांच व कार्यवाही के समय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मौके पर पहुंच गईं। वे अपने साथ वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी ले गईं। दोनों पक्षों के बीच तीखी बातचीत हुई। आरोप प्रत्यारोप लगे। प्रवर्तन निदेशालय ने बताया कि यह छापा कोयला तस्करी से संबंधित मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े हुए हैं। तृणमूल कांग्रेस ने आरोप लगाया कि प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों ने छापे मारने की आड़ में उनके चुनावी रणनीति सम्बन्धी रिकार्ड को जब्त किया।

प्रत्याशियों की सूची भी छीन ली गई है। इस आलेख के प्रेस में जाने तक तृणमूल कांग्रेस के लगभग दो दर्जन सांसद राजधानी दिल्ली में गृह मंत्रालय के बाहर धरना दे रहे हैं। केन्द्रीय जांच एजेंसी के सामने राज्य पुलिस को खड़ा कर देना गंभीर संवैधानिक संकट पैदा कर सकता है। सबसे खास बात है कि मुख्यमंत्री होने के बावजूद ममता ने घोषणा की कि प्रवर्तन निदेशालय के छापे के जवाब में पश्चिम बंगाल में भाजपा के कार्यालयों पर छापेमारी की जाए तो क्या होगा। वे संविधान की परवाह नहीं करतीं। केन्द्र से टकराव लेना और स्वयं को केन्द्र द्वारा पीड़ित बताना ममता की राजनीति का हिस्सा है। पश्चिम बंगाल में जब कब केन्द्र और राज्य के बीच टकराव की घटनाएं होती ही रहती हैं। जनता ऐसी घटनाओं व ममता से ऊब गई है। केन्द्र से टकराने की सतही राजनीति


तृणमूल कांग्रेस की स्थिति कमजोर हो रही है। उम्र और परिस्थितियां ममता बनर्जी की सरकार बनाने में सक्षम नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बहुत पहले ही बंगाल विधानसभा चुनाव को जीतने की महत्वाकांक्षा प्रकट कर दी थी। इसी क्रम में गृह मंत्री अमित शाह ने बंगाल का तीन दिवसीय दौरा किया था। उन्होंने तृणमूल के कुशासन की ओर जनता का ध्यान खींचा और राजग की शक्ति का गुरु मंत्र भाजपा के नेताओं को दिया। शाह ने कहा कि भय, भ्रष्टाचार, कुशासन और विदेशी घुसपैठ की राजनीति के स्थान पर विकास, विरासत और गरीब कल्याण की मजबूत सरकार बनाने का संकल्प बंगाल की जनता में दिखाई पड़ रहा है। ममता बनर्जी 2021 का चुनाव जीती भी थीं। भाजपा भी पूरे आत्मविश्वास के साथ चुनाव लड़ी और नेता विरोधी दल के पद को हथियाने में सफल रही। 2021 की तुलना में राजनीतिक माहौल बदल चुका है। राजग का विस्तार हो रहा है। विदेशी घुसपैठ को लेकर ममता विपक्ष के आरोपों के घेरे में हैं। पड़ोसी बांग्लादेश में हिन्दुओं के विरुद्ध हुई हिंसा से विश्व आहत है।

पश्चिम बंगाल के हिन्दू मतदाता भी बांग्लादेश की घटनाओं से आक्रोश में हैं। पिछले विधानसभा के चुनाव में ममता पर अल्पसंख्यकवादी होने के आरोप लगे थे। अब वे स्वयं को हिन्दू सिद्ध करने के लिए प्रयासरत हैं। पिछले चुनाव में उन्होंने मंच से ही चंडी पाठ किया था। इस बार की चुनौती बड़ी है। 2021 की तुलना में राष्ट्रवाद का विचार काफी सशक्त हो गया है। ममता द्वारा चुनाव के पहले दुर्गा आंगन और सिलीगुड़ी में महाकाल मंदिर निर्माण की घोषणा के संकेत भी दिए गए हैं। तृणमूल कांग्रेस के नेता और विधायक हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद की नींव रखी। यहां प्रत्येक शुक्रवार को भारी संख्या में लोग आते हैं। एकत्रीकरण बढ़ता ही जा रहा है। यद्यपि ममता बनर्जी के विधायक हुमायूं कबीर को पार्टी से निलंबित कर दिया गया है, तो भी स्थानीय नागरिक काफी डरे सहमे हुए हैं।


बाबर भारतीय मुसलमान नहीं था। वह विदेशी हमलावर था। उसी की सहायता और मार्गदर्शन में बाबर के सिपहसालार सैयद मीर बाकी ने 1528 में अयोध्या का श्रीराम जन्मभूमि मंदिर ध्वस्त कर दिया था। दीर्घकाल तक चले आंदोलन से श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण हुआ। दिव्य और भव्य श्रीराम जन्मभूमि मंदिर बन चुका है। लाखों श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। अयोध्या में की गई खुदाई की पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्ट में 3500 साल ईसापूर्व का वर्णन है। रिपोर्ट के अनुसार ईसापूर्व 3500 वर्ष से 1000 ईसापूर्व तक अयोध्या एक बस्ती है। एएसआई के अनुसार यहां एक दिव्य और भव्य मंदिर पहले से था। रिपोर्ट में 500 ईस्वी तक मंदिर के अस्तित्व के साक्ष्य हैं। मंदिर गिराकर मस्जिद बनाने के पाप को सुधारा जा चुका है। क्या देश बाबर को भूल सकता है?

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर आंदोलन और इसी विचार परिवार के अन्य संगठन भारतीय जनमानस का दिल जीतने में कामयाब हुए हैं। अब स्वयं को हिन्दू बताना लज्जा का विषय नहीं है। ममता बनर्जी बहुत पहले से ही अल्पसंख्यकवादी हैं। वे और इंडी गठबंधन के अधिकांश नेता स्वयं को हिन्दू सिद्ध करने में जुटे हुए हैं। पश्चिम बंगाल की राजनीतिक स्थिति के संकेत सुस्पष्ट हैं। ममता पश्चिम बंगाल में बहुत कमजोर स्थिति में हैं। अभी चुनाव के लिए कुछ महीने बचे हैं। पश्चिम बंगाल की उथल-पुथल को देश देख रहा है।


दरअसल ममता बनर्जी को जनता के बीच तृणमूल कांग्रेस विरोधी भावनाएं सुस्पष्ट दिखाई दे रही हैं। ममता के मन में विधानसभा चुनाव को लेकर उत्साह है। वे हिन्दू ध्रुवीकरण की रणनीति पर अग्रसर हैं, लेकिन चुनाव में ध्रुवीकरण का लाभ उनको नहीं मिलेगा। ममता बनर्जी की राज्य सरकार के कार्यकाल में सत्ता संरक्षित लूट के मामले लगातार बढ़े हैं। आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज व संदेशखाली के महिला उत्पीड़न के मामले सर्वविदित हैं। ममता के राज्य में अल्पसंख्यक तुष्टीकरण नया नहीं है। बेरोजगारी बढ़ी है। लोग गांव छोडकर पलायन कर रहे हैं और विकास का कहीं कोई नाम नहीं है। विपक्षी भाजपा कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न जारी है।


भारतीय संविधान में केन्द्र व राज्यों के बीच विषयों की एक सूची है। इस सूची के अनुसार पुलिस राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आती है और सीबीआई ईडी केन्द्रीय प्राधिकार में होते हैं। दोनों को आमने-सामने खड़ा कर देना संविधान का उल्लंघन है। दोनों परस्पर पूरक हैं, लेकिन ममता बनर्जी ने देश के संघीय ढांचे का ध्यान नहीं रखा। ऐसा कई बार हुआ है। वे विकल्प नहीं छोड़तीं और केन्द्रीय सत्ता को दोष दिया करती हैं। संविधान के अनुच्छेद 355 में वाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति से राज्य की संरक्षा करने का संघ का कर्तव्य है। ये भी है कि वाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति की सुरक्षा के साथ प्रत्येक राज्य की सरकार का इस संविधान के अपबंधों के अनुसार चलाया जाना सुनिश्चित करें। लेकिन ममता बनर्जी संविधान की मूल भावना का उल्लंघन कर रही हैं।

उन्हें याद कराना पड़ेगा कि मुख्यमंत्री के सम्माननीय पद पर बैठने के समय संविधान पालन की शपथ ली जाती है। वे सम्माननीय मुख्यमंत्री हैं। उन्हें संविधान विरोधी कार्य नहीं करना चाहिए। लेकिन उनका एक स्वभाव है। वे बहुधा गुस्से में आ जाती हैं। उन्होंने भाजपा को चुनौती दी है कि वह तृणमूल कांग्रेस को लोकतांत्रिक तरीके से हराकर दिखाएं। वे चुनौती की भाषा बोलती हैं। लेकिन असल चुनौती आगामी विधानसभा चुनाव हैं। इसमें भाजपा की जीत पक्की है। केन्द्र से टकराने की सतही राजनीति