

हिन्दुत्व केवल एक धर्म या मत नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में विकसित एक समग्र जीवन पद्धति और मानवीय अनुभूति है, जो सत्य, अहिंसा, करुणा, कर्म, और मोक्ष के सिद्धांतों पर आधारित है। यह जातीयता से परे, समस्त प्राणियों के प्रति चेतना और सांस्कृतिक/सामाजिक विश्वासों का एक मिश्रित दृष्टिकोण है।
वैज्ञानिक खोजों ने मानव संहार के अनेक उपकरण बनाए हैं। मध्य पूर्व में युद्ध जारी है। मानवता बारूद के ढेर पर है। विज्ञान निर्मम है। उसका लोकमंगल से कोई लेना देना नहीं है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले धर्महीन समाज विश्व के अस्तित्व के लिए खतरा हैं। हिन्दू धर्म की दृष्टि में पूरी पृथ्वी एक परिवार है। इस परिवार में केवल मानव समाज का हित चिंतन ही नहीं है। वैदिक चिंतन में सभी जीव पशु पक्षी कीट पतिंग भी हमारे परिजन हैं। वनस्पतियां औषधियां भी उपास्य हैं। विज्ञान में ऐसी प्रीतिपूर्ण दृष्टि नहीं है। विज्ञान सिर्फ सत्य तथ्य देता है। सत्य तथ्य शिरोधार्य है। लेकिन सत्य का शिव और सुंदर होना भी जरूरी है। वैदिक दर्शन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। लोकमंगल का उद्देश्य है और विश्व को सुंदर बनाने की अभिलाषा है। इन सबका सार हिन्दुत्व है। कोई अंधविश्वास नहीं। कोई जबरदस्ती नहीं। असहमत के प्रति भी आदर भाव है। हिन्दुत्व में प्रेय श्रेय साथ साथ हैं। विज्ञान और लोक मंगल भी परस्पर प्रीति में हैं।
डा० राधा कृष्णन ने कहा है ”वैज्ञानिक हमें ऐसे विभिन्न ढंग बताते है जिनसे पृथ्वी नष्ट हो सकती है। यह कभी सुदूर भविष्य में चन्द्रमा के बहुत निकट आ पहुंचने से या सूर्य के ठंडा पड़ जाने से नष्ट हो सकती है। कोई पुच्छल तारा पृथ्वी से टकरा सकता है। धरती से ही कोई जहरीली गैस निकल सकती है। परन्तु यह सब बहुत दूर की सम्भावनाएं हैं; जबकि अधिक सम्भावना इस बात की है कि मानव-जाति स्वयं जान-बूझकर किए गए कार्यों से और अपनी मूर्खता और स्वार्थ के कारण, जो मानव-स्वभाव में मजबूती से जमे हुए हैं, नष्ट हो सकती है। यह बड़ी करुणाजनक बात है कि ऐसे संसार में जो हम सब के आनंद लेने के लिए है और जो हम यदि आजकल युद्ध यन्त्रजात को पूर्णता तक पहुंचने में लगाई जा रही ऊर्जाओं के केवल थोड़े-से हिस्से का ही इसके लिए उपयोग करें तो सबक¨ आनंदमय बनाया जा सकता है।”
हिन्दुत्व भारत की प्रकृति है और संस्कृति भी। यह भारत के लोगों की जीवनशैली है। इस जीवन शैली में सभी विश्वासों के प्रति आदर भाव है। लेकिन भारतीय राजनीति के आख्यान में हिन्दुत्व के अनेक चेहरे है। उग्र हिन्दुत्व, मुलायम (साफ्ट) हिन्दुत्व, साम्प्रदायिक हिन्दुत्व आदि अनेक विशेषण मूल हिन्दुत्व पर आक्रामक हैं। अंग्रेजी भाषान्तर में हिन्दुत्व को हिन्दुइज्म कहा जाता है। इज्म विचार होता है। विचार ‘वाद‘ होता है। वाद का प्रतिवाद भी एक विचार होता है। पूंजीवाद-कैप्टलिज्म है। समाजवाद सोशलिज्म है। इसी तरह कम्युनिज्म है। अंग्रेजी का हिन्दुइज्म भी हिन्दूवाद का अर्थ देता है। लेकिन हिन्दुत्व हिन्दूवाद नही है। हिन्दुत्व समग्र मानवीय अनुभूति है। वीर होना वीरवाद नही होता, वीर होने का भाव वीरता है। दयावान होना दयावाद नही दयालुता है। हिन्दू होना हिन्दुता या हिन्दुत्व है। कुछ विद्वान हिन्दू को मुसलमानो द्वारा दिया गया शब्द मानते रहे हैं। लेकिन यह सही नही है। हिन्दू शब्द का प्राचीनतम उल्लेख ‘अवेस्ता‘ में है और अवेस्ता इस्लाम से सैकड़ो वर्ष पुराना है। डेरियस (522-486 ई०पू०) के शिलालेख में भी हिन्दू शब्द का उल्लेख है। हिन्दू शब्द विशेष संस्कृति वाले जनसमूह का घौतक है।
डा० राधा कृष्णन ने वाराणसी हिन्दू विश्व विद्यालय व कलकत्ता (कोलकाता) विश्व विद्यालय में हिन्दू तत्व पर 1942 में भाषण दिए थे। उन्होंने ‘धार्मिक आदर्शो की दृष्टि से समाज के पुनर्गठन‘ पर कलकत्ता (कोलकाता) विश्वविद्यालय में कहा कि ‘‘भारतीय जीवन और विचार के किसी पहलू पर तुलनात्मक दृष्टि से विवेचन एक विस्तृत विषय है।‘‘ जीवन मूल्यों से समाज के आदर्श व सांस्कृतिक व्यवहार प्रभावित होते हैं और सभ्यता की उम्र भी। भारतीय राष्ट्रजीवन की सांस्कृतिक निरंतरता स्वयं सिद्ध है। और प्राचीनता का मूल कारण विचारणीय है। डा० राधा कृष्णन ने औरंगजेब द्वारा अपने अध्यापक मुल्ला साहब को लिखे पत्र का सुंदर उदाहरण दिया है ‘‘तुमने मेरे पिता शाहजहां से कहा था कि तुम मुझे दर्शन पढ़ाओगे। यह ठीक है, मुझे भली भांति याद है, कि तुमने अनेक वर्षो तक मुझे वस्तुओं के सम्बन्ध में ऐसे अनेक अव्यक्त प्रश्न समझाए, जिनसे मन को कोई संतोष नहीं होता और जिनका मानव – समाज के लिए कोई उपयोग नहीं है। ऐसी थोथी धारणाएं और खाली कल्पनाएं, जिनकी केवल यह विशेषता थी कि उन्हें समझ पाना बहुत कठिन था और भूल पाना बहुत सरल था। क्या तुमने कभी मुझे यह सिखाने की चेष्टा की कि शहर पर घेरा कैसे डाला जाता है या सेना को किस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है?‘‘ औरंगजेब के जीवन का आदर्श युद्ध है। युद्ध मानवीय मूल्य रहित हिंसा है।

डा० राधा कृष्णन के अनुसार ‘‘तत्कालीन विश्व का संकट यही है कि वह सैनिक व्यवस्था के विषय में सब कुछ जानता है और जीवन मूल्यों के दर्शन व धर्म के केन्द्रीभूत प्रश्नो के सम्बन्ध में बहुत कम जानता है।‘‘ भारतीय संस्कृति में मनुष्य की महिमा है। आनंदमय जीवन की अभिलाषा है। इस अभिलाषा को पूरा करने की आचार संहिता है। यह संहिता हिन्दू धर्म है। इस आचार संहिता में हिंसा का कोई स्थान नहीं है। गांधी जी अहिंसा को उत्कृष्ट जीवन मूल्य बताते थे। इस आदर्श का प्रेरणा केन्द्र हिन्दुत्व है। संप्रति दुनिया में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की आंधी है। भारत में यह सेकुलरवाद के रास्ते हिन्दू धर्म को भी कालवाह्य घोषित करने पर आमादा है। अन्य पंथ रिलीजन अपनी कट्टरता के चलते वैज्ञानिक दृष्टिकोण को श्रेष्ठ नहीं मानते। वैज्ञानिक दृष्टिकोण अनुचित नहीं है। वैज्ञानिको ने प्रकृति के तमाम रहस्यों को उघाड़ने का काम किया है। अंधविश्वासी मतों, पंथों को भी चुनौती मिली है।
विज्ञान सत्य की खोज करता है। समाज ऐसी खोजों का उपयोग करता है। समाज इनका दुरूपयोग भी करता है। विश्व में पंथिक मजहबी मान्यताओं को लेकर तमाम युद्ध हुए हैं। हिन्दू दर्शन भी सत्य का शोध करता है। दर्शन का उद्देश्य केवल सत्य का निर्वचन करना ही नहीं है। इसका ध्येय मनुष्य का दुख दूर करना है। हिन्दू धर्म का उद्देश्य दुख का निवारण और आनंद की प्राप्ति है। समाज में आनंद का आपूरण विज्ञान का लक्ष्य नहीं है। विज्ञान के गले में लोकमंगल की घंटी डालने की आवश्यकता है। यह कार्य हिन्दुत्व के रास्ते अधिक संभव है। हिन्दुत्व लोकमंगल का पर्याय है।
भारत का जीवन ध्येय आनंद है। केवल वैयक्तिक आनंद नहीं; सामाजिक सामूहिक आनंद भी। विवेकानंद ने कहा है, ‘‘सभी देशो के निचले स्तर के मनुष्य इन्द्रियों के आनंद में उत्साह दिखाते हैं। किन्तु जो सच्चे अर्थों में शिक्षित और सुसंस्कृत हैं, उनके आनंद का आधार विचार और कला होती है। दर्शन और विज्ञान होता है‘‘। सुख और आनंद के अनेक मानसिक व बौद्धिक तल होते है। इन्द्रिय भोग का सुख निम्न तल है। ज्ञान का सुख आनंद उच्च तल पर है। कला का आनंद गहरा है। लेकिन अनुभूति दर्शन का आनंद बहुत गहरा है। उपनिषद् दर्शन में आनंद की गहन अनुभूति है। तैत्तिरीय उपनिषद् में आनंद की व्याख्या है। शुरुवात में कहते हैं, ‘‘सैषा आनंदस्य मीमांसा भवति-अब उस आनंद की मीमांसा करते हैं।‘‘ बताते हैं, ‘‘मनुष्य युवा हो, श्रेष्ठ आचरण वाला हो। अध्ययनशील हो। संपूर्ण अंग बल युक्त हो। स्वस्थ हो। धन सम्पदा से युक्त हो तो इस लोक में आनंद है।‘‘ यहां आनंद के सभी उपकरण प्रत्यक्ष हैं। भौतिक हैं। संसारी हैं। कोई अंध आस्था नहीं। भाववाद नहीं। आनंद की प्राप्ति का स्थान भी यही लोक है। आनंद का आनंद इसी संसार में है।























