

क्या आज की पीढ़ी सच में आज़ाद है… या सिर्फ हालातों की कैद में जी रही है? रिश्ते अब भरोसे पर नहीं, शर्तों पर टिके हैं। फैसले सपनों से नहीं, डर से लिए जा रहे हैं। क्या आज रिश्ते, शर्तें और डर से घिरी एक पीढ़ी..! क्या सच में आज़ाद हैं हम?
आज एक ऐसा सवाल… जो शायद हर घर में है…पर कोई खुलकर पूछ नहीं रहा। आज की पीढ़ी…क्या सच में आज़ाद है? या सिर्फ हालातों की कैद में जी रही है? रिश्ते अब भरोसे पर नहीं… शर्तों पर टिके हैं। फैसले सपनों से नहीं… डर से लिए जा रहे हैं।
आख़िर क्यों…? आज के समय में अगर कोई सबसे जोखिम भरा सामाजिक कार्य है… तो वह है — किसी से रिश्ते की बात करना। पहले रिश्ते परिवार तय करते थे… अब “प्रोफ़ाइल” तय करती है।
पहले भरोसा होता था… अब “चेकलिस्ट” होती है। हाइट कितनी है? सैलरी कितनी है? घर अपना है या किराए का? मम्मी-पापा कितना दखल देंगे? लड़की “एडजस्ट” करेगी या नहीं? लड़का “ओपन माइंडेड” है या नहीं? इस गणित में इंसान गायब है…और आंकड़े मौजूद हैं।
आज रिश्ते भावनाओं से ज़्यादा… एक “प्रोजेक्ट” बन गए हैं। लड़कियों को ऐसा घर चाहिए जहाँ उनसे कोई घरेलू अपेक्षा न हो। लड़कों को ऐसी पत्नी चाहिए जो आधुनिक भी हो… और पारंपरिक भी… बिना सवाल किए। इन सबके बीच एक पूरी पीढ़ी समझौतों, तुलना और असुरक्षा में उलझती जा रही है।
दोनों पक्ष चाहते हैं कि सामने वाला झुके… पर खुद झुकने को कोई तैयार नहीं। यही वजह है कि रिश्ता तय करने में 6 महीने लगते हैं… और टूटने में 6 हफ्ते भी नहीं। हर प्रोफ़ाइल एक विकल्प है… और हर विकल्प अस्थायी। “शायद इससे बेहतर मिल जाए” — यही सोच रिश्तों को टिकने नहीं देती।
हनीमून पेरिस में चाहिए… लेकिन अपने ही शहर की जिम्मेदारियों से डर लगता है। खेती कोई करना नहीं चाहता… पर ज़मीन ज़रूर चाहिए। मेहनत कम… स्टेटस ज़्यादा चाहिए। प्रेम पाना सब चाहते हैं पर देना कोई नहीं चाहता यह विरोधाभास सिर्फ भौगोलिक नहीं… मानसिक है। हम वैश्विक सपने देख रहे हैं… लेकिन स्थानीय जिम्मेदारियों से भाग रहे हैं।
सबसे ज़्यादा दुविधा में आज माँ-बाप हैं। वे बच्चों से डरते हैं — कहीं कुछ कह दिया तो “इमोशनल ब्लैकमेल” न कहलाएँ। बच्चे शादी से डरते हैं — जिम्मेदारी और स्थायित्व से। दोनों तरफ डर है… और रिश्ते बीच में पिस रहे हैं।स्वतंत्रता का मतलब जिम्मेदारी से भागना नहीं होता… बल्कि उसे निभाने की क्षमता का होता है ।
सोशल मीडिया और मैट्रिमोनियल ऐप्स ने रिश्तों को “बाज़ार” बना दिया है। हर प्रोफ़ाइल तुलना का विषय है। हर रिश्ता एक “ऑप्शन” है। “शायद इससे बेहतर मिल जाए…” यही सोच… किसी को “पर्याप्त” नहीं रहने देती। लेकिन विवाह कोई मोबाइल फोन नहीं जिसे हर साल अपग्रेड कर लिया जाए। यह एक साझेदारी है… जिसे निभाने की मानसिकता चाहिए।
आइये जानते हैं इसका समाधान क्या है —पहला — अपेक्षाओं की ईमानदार समीक्षा। क्या जो हम चाहते हैं… वह हम देने को तैयार हैं?———दूसरा — संवाद। सिर्फ बोलना नहीं… सुनना भी।————तीसरा — परिवार को दुश्मन नहीं… मार्गदर्शक मानना।——-चौथा — स्थानीय जीवन का सम्मान। पेरिस का सपना बुरा नहीं… पर अपनी मिट्टी से शर्मिंदा होना गलत है।
यह पीढ़ी प्रतिभाशाली है। शिक्षित है। संभावनाओं से भरी है। लेकिन अगर रिश्तों में साहस नहीं होगा — समझौता करने का साहस… साथ निभाने का साहस… गलतियों से सीखने का साहस… तो आज़ादी सिर्फ शब्द रह जाएगी। आज सवाल वक़्त पूछ रहा है — क्या हम रिश्तों को शर्तों से आज़ाद कर पाएँगे? क्या हम डर से बाहर निकलकर भरोसे की ओर लौटेंगे?
क्या आज का प्रेम ऐसा हो गया है कि जिसने जना उसे जानतें नहीं,,,,, जिसे जानते नहीं उस पर जॉ निसार करते हैं
क्या यह पीढ़ी सच में स्वतंत्र है? या फिर आधुनिकता के नाम पर भावनात्मक रूप से असुरक्षित? आज का यह वीडियो सिर्फ शादी/रिश्ते या प्रेम पर चर्चा नहीं है… यह हमारी सोच, हमारे डर और हमारे बदलते सामाजिक ढांचे पर एक गंभीर सवाल है। आप क्या सोचते हैं? क्या रिश्ते या प्रेम शर्तों से आज़ाद हो पाएँगे? आप क्या सोचते हैं…? कमेंट में जरूर लिखिए। वीडियो पसंद आए तो लाइक, शेयर और चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें।























