

“एको रूद्र द्वितीयो नास्ति”—अर्थात् रूद्र एक ही हैं, दूसरा कोई नहीं। आख़िर शिव को देव नहीं, महादेव क्यों कहा गया? क्या कारण है कि वे केवल पूजनीय ही नहीं, बल्कि भारतीय चेतना के केंद्र हैं? शिव संहारक भी हैं, सृजन के आधार भी। वैराग्य के प्रतीक भी हैं और करुणा के सागर भी।
हम भारत के लोग देवों को भी धरती पर बुलाते रहते हैं। ईश्वर भी धर्म संस्थापना के लिए अवतार लेते हैं। भारत देवभूमि है। भारतवासी बहुदेव उपासक हैं। जहां जहां आभा, प्रभा, सुभा और दिव्यता वहां वहां देवता। शिव देव नहीं महादेव हैं। वे भारत के मन में रमते हैं। एक अकेले ही। एको रूद्र द्वितीयोनास्ति। भारत के कुछेक विद्वान रूद्र शिव को आयातित देवता मानते हैं। शिव उपासना पश्चिम एशिया व मध्य एशिया तक विस्तृत थी भी। वे इसी क्षेत्र को शिव उपासना का मूल केन्द्र बताने की गल्ती करते है। माक्र्सवादी चिन्तक डाॅ0 रामविलास शर्मा ने भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश (पृष्ठ 679) में लिखा है “वास्तव में शैवमत, वैष्णवमत, बौद्धमत इन सबके स्रोत भारत में थे।
यहां से इन मतों का प्रसार मध्य एशिया और पश्चिमी एशिया में हुआ।” शिव गूढ़ रहस्य हैं। युधिष्ठिर ने शर शैय्या पर लेटे भीष्म से तमाम प्रश्न पूछे थे। वे भीष्म से शिव गुण भी सुनना चाहते थे। भीष्म ने कहा, “शिवगुणों का वर्णन करने में मैं असमर्थ हूं। वे सर्वत्र व्यापक हैं। ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र के सृष्टा हैं। वे प्रकृति से परे और पुरूष से विलक्षण हैं। श्रीकृष्ण के अलावा उनका तत्व दूसरा कोई नहीं जानता। फिर अर्जुन से कहा, “रूद्र भक्ति के कारण ही श्रीकृष्ण ने जगत् को व्याप्त किया है।” संप्रति महाशिवरात्रि उत्सवों में भारत सहित एशिया के बड़े भूभाग में बम भोले की बम बम है।
शिव भोले शंकर हैं, औघड़दानी हैं। गण समूहों के मित्र हैं। गणों के साथ स्वयं भी नृत्य करते हैं। गण देवता गणेश स्वाभाविक ही उनके पुत्र हैं। सत्य आराध्य है। लेकिन शिव सत्य आनंददाता हैं। सत्य और शिव का एकात्म सुंदर होता है। शिव अखिल ब्रह्म की ऊर्जा हैं। इस ऊर्जा प्राप्ति के प्रयास जरूरी हैं। पार्वती को भी शिव प्राप्ति के लिए महातप करना पड़ा था। कालिदास के ‘कुमार संभव’ में तपरत पार्वती को एक ब्रह्मचारी ने बहुत भड़काया “पार्वती! आप भी किस प्रेम में फंस गई। आपका सुंदर हांथ सांप लिपटे शंकर को कैसे छुएगा। कहां हंस छपी चूनर ओढ़े आप? और कहां खाल ओढ़े शंकर?”
शिव शंकर के रूप-कुरूप पर उसने बहुत कुछ कहा। पार्वती ने कहा “संसार के सारे रूप शिव के ही हैं-विश्वकूर्तेखाधार्यते वपु।” शिव ही सभी रूपों में प्रकट होकर रूप रूप प्रतिरूप हैं। कालिदास के कथानक में जब तब शिव ने अपना रूप प्रकट कर दिया। शिव बोले “अब मैं तुम्हारा दास हूं, पार्वती-तवस्मि दासः।” मन करता है कि प्रश्न पूंछू शिव से-महादेव! इतना कठोर तप क्यों कराते हैं? लेकिन अपना प्रश्न वापस भी लेता हूं। शिव तप का पुरूस्कार भी तो देते हैं। तप प्रभाव में वे स्वयं भक्त के भी भक्त बन जाते हैं।
सुनता आया हूं कि शिव सोम प्रेमी हैं। सोम प्रकृति की सृजन शक्ति है। सृजन की यही शक्ति शिव ललाट की दीप्ति है। शिव के माथे पर सोम चन्द्र हैं। वैदिक ऋषियों के दुलारे सोम वनस्पतियों के राजा हैं। सोम प्रसन्न होते हैं, वनस्पतियां औषधियां उगती हैं खिलती हैं खिलखिलाती हैं। भारतीय सप्ताह मंे एक दिन सोम का। पहला दिन रविवार रवि का तो दूसरा दिन सोमवार सोम का। सोमवार को शिव आराधन की मुहूर्त जाना गया है। ठीक भी है।
हमारे समाज में भी प्रतिष्ठित लोग सप्ताह में एक दिन खुलकर मिलते हैं, बाकी दिन व्यस्त रहते हैं। शिवभक्तों को सोमवार और शिवरात्रि प्रीतिकर है। शिव भी सोमवार का दिन भक्तों के लिए ही खाली रखते होंगे। नहीं जानता सच। काशी बहुत जाता हूं लेकिन मंदिर दर्शन बहुत पहले एक बार ही हुआ। मैंने समूची काशी में शिव चैतन्य पाया है। मैं कर्मकाण्डी हूं नहीं। योग, तप से परिचित नहीं लेकिन भारत के मन के साथ मन मिलाते हुए देवों के देव महादेव को नमस्कार करता हूं।
शिव सभी कालों में है। काल के परे भी है लेकिन भारत के मन में वे पार्वती के साथ हैं। कालिदास ने शिव बरात का मनोरम शब्द चित्र खींचा है। बताया है कि शिव बरात नगर पहुंची। स्त्रियां अपना कामधाम छोड़कर छतों की ओर भागी। एक की जूड़े की माला टूट गई। एक ने दांयी आंख में ही काजल लगाया था, वह बाई आंख का काजल लगाना छोड़ भाग चली। पार्वती शिव जगत् के माता पिता हैं। विवाह के बाद सभी देवों ने शुभकामनाएं दीं।” कालिदास जैसे प्रत्यक्षदशÊ बराती थे-शिव बारात के। उनकी अनुभूति में भारत का मन-दर्पण प्रकट हुआ है।
सूरदास भी श्रीकृष्ण की बरात में गाना चाहते थे-सूरदास होई कुटिल बराती गीत सुमंगल गइहौं। अजब अंतर्विरोध, सुमंगल गीत लेकिन कुटिल बराती। हम शिव भक्त कांवड़ियों को दूर से ही देखते आए हैं। हम भी शिवार्चन उत्सवों में कुटिल आस्तिक की तरह दूर से सम्मिलित होते रहे हैं। मन को वात्सल्य रस देने वाली सई नदी हमारे गांव के पास ही शिव सीढ़ी का जलाभिषेक करती है। यहां भवरेश्वर शिव मंदिर में शिवरात्रि और सावन के सोमवारों में लाखों श्रद्धालु जुटते हैं। लोकमन हर हर महादेव हो जाता है।
भारतीय साहित्य शिव-पार्वती के सम्वाद से भरापूरा है। पार्वती प्रश्नाकुल हैं और शिव समाधानकत्र्ता। तुलसीदास के रामचरित मानस में पार्वती ने सीधे राम के अस्तित्व पर ही प्रश्न पूंछा। शिव ने ब्रह्म तत्व समझाया लेकिन पार्वती ने स्वयं परीक्षा ली। यह भी उचित था। अनुभव करना सुनने से ज्यादा श्रेष्ठ है। लेकिन शिव सब जानते थे। वे प्रतिपल यत्र तत्र सर्वत्र उपस्थित हैं। उनके कण्ठ मंे विष है। वे नीलकंठ हैं। गले में सांप भी हैं लेकिन चन्द्रमा शिव का प्रिय आभूषण है। सोम और चन्द्र पर्यायवाची हैं। शिव ने सनत कुमारों को बताया कि उनके तीन नेत्र हैं।
सूर्य दांया नेत्र है और बांया चन्द्रमा। अग्नि मध्य नेत्र हैं। सूर्य की अपनी प्रिय राशि सिंह है। चन्द्र की कर्क है। सूर्य इस यात्रा में कर्क से सिंह क्षेत्र में पहुंचते हैं। तब शिवार्चन की शुभ मुहुर्त बनती है। ऐसी संक्रांति सावन मास में पड़ती है। सो शिव को सावन प्रिय है। श्रीकृष्ण को बसंत ऋतु प्रिय है और मार्गशीर्ष-अगहन का मास। लेकिन शिव की बात निराली है। ऋतुराज बसंत में पृथ्वी और वायु का चरम आनंद है। बसंत हहराता है तब क्षिति, जल, पावक और गगन समीर भी मधुरसा हो जाते हैं। शिवरात्रि आती है। वायु सुकुमार लज्जाशील नायिका की तरह बहती है।
मनुष्य सुगंध प्रिय है। ऋग्वेद वाले रूद्र शिव ‘सुगंधिं पुष्टिवर्द्धनं’ हैं। देवों को पुष्पार्चन किया जाता है लेकिन शिव को बेलपत्र और धतूरे का फल। शिव मस्त मस्त बिंदास देवता हैं। परम योगी। चरमोत्कर्ष वाले नृत्यकत्र्ता। श्रीकृष्ण के पास बांसुरी तो शिव के पास डमरू। बांसुरी की धुन पर तीनों लोक मोहित हुए थे तो डमरू की धुन पर तीनों लोक अस्तित्व में रहते हैं। शिव जब चाहते हैं, रूद्र हो जाते हैं। प्रलयंकार हो जाते हैं। लेकिन यही रूद्र शिव हैं। ऋग्वेद में “जो रूद्र है, वही शिव भी है।” त्रिशूल उनका हथियार। सोंचता हूं कि ये तीन शूल क्या हैं? ये दैविक, दैहिक और भौतिक कष्ट तो नहीं हैं? या भौतिक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक वेदनाएं हैं।
शिव दुख हारी हैं-त्रिशूल धारक जो हैं। लेकिन सोंचने से मन नहीं भरता। मन यहां, वहां, जहां, तहां भागता ही है। राजनीति में हूं सो मंच, माला, माइक का त्रिशूल भीतर बहुत गहरे तक धंसा हुआ है। कह सकता हूं कि मैं भी त्रिशूलधारी हूं। सोम सामने है, भीतर ओम है। सोम ओम की यारी पुरानी है। लेकिन सोम से वंचित हूं। ओम् की अनुभूति नहीं। ऋग्वेद के ऋषि वशिष्ठ ने आर्तभाव से पुकारा था न्न्यम्बक रूद्र को-हमें पकी ककड़ी की तरह मृत्यु बंधन से मुक्त करो।” मैं भी डंठल से चिपका हुआ पका फल हूं। शिव निर्णय लें कि हमें कब संसार से मुक्त करना है? शिव को ओम् के साथ नमस्कार है-ओम नमः शिवाय।
























