

प्रकृति में जैव विविधता है। पशुओं के प्रति लगाव का इतिहास पुराना है। मनुष्य और पशुओं के मध्य आत्मीयता का भाव वैदिक साहित्य से लेकर आज तक प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता है। कुत्ते हमारे स्वाभाविक परिजन हैं। उनकी सूंघने व सुनने की क्षमता विलक्षण है। संप्रति आधुनिक सभ्यों का एक वर्ग कुत्तों से चिढ़ा हुआ है। कोर्ट कचहरी तक कुत्तों पर बहस है। कुत्तों को संसार से शून्य करना चाहता है। यह बात सही है कि जब कब कुत्ते आक्रामक भी हो जाते हैं, लेकिन वे स्वयं अपनी ओर से कभी आक्रामक नहीं होते। उनकी आंखों में स्वाभाविक आत्मीय लगाव देखा जा सकता है। वे अपने लिए कोई संपदा नहीं चाहते। वे इस विराट संसार में अपने लिए छोटी सी जगह चाहते हैं। दौड़ने पर वे वह जगह छोड़कर दूसरी जगह बैठ जाते हैं। पालतू कुत्तों की बात अलग है। बाकी सब भूखे प्यासे मरते हैं।
वैदिक साहित्य में कहा गया है, ”मनुष्य और पशु दोनों में एक प्राण शक्ति है।” उनमें आत्मीयता है। बाघ आदि जानवर कभी पालतू नहीं रहे। ऋग्वेद के शिव और रुद्र पशुपति भी हैं। वैदिक इंडेक्स में लिखा है कि, ”ऋग्वेद में प्राणियों को तीन श्रेणियां में बांटा गया है, पहली श्रेणी वायव्य है। इस श्रेणी में पक्षी आते हैं। दूसरी श्रेणी अरण्य है। अरण्य का अर्थ है वन। इस श्रेणी में जंगल में रहने वाले पशु आते हैं और ग्राम्य-गांव में रहने वाले पालतू पशु हैं। वैदिक काल में पशुओं के प्रति प्रेम बहुत सघन रूप में व्यक्त हुआ है। अग्नि ऋग्वेद में बड़े देवता हैं। ऋग्वेद के ऋषि के ध्यान में अग्नि की पशु जैसी चंचलता की ओर गया है। ऋग्वेद (1.65.5) में कहते हैं, ”अग्नि पशु जैसे चंचल हैं।” कभी-कभी घरेलू पशु खो जाते हैं। खोजने पर मिल जाते हैं। पशु के खो जाने और बाद में उसके मिल जाने पर प्रसन्नता होती है।
ऋग्वेद में कहते हैं, ”पूषन देव हमें वैसे ही मिलते हैं जैसे खोए हुए पशु खोजने पर मिल जाते हैं।” अनेक पशु इधर-उधर घूमा करते हैं। ऋषि ऐसे पशुओ की तुलना अग्नि देवता से करते हैं, ”अग्नि वैसे ही फैल जाता है, जैसे रक्षक के बिना पशु इधर-उधर भागता है।”
पशुओं से अपने कुल या वंश का सम्बंध जोड़ना सर्व विदित है। सभी पशु प्रिय हैं, लेकिन कुत्ते प्राचीन भारतीय इतिहास से लेकर आधुनिक काल तक अपनी विशेष पहचान बनाए हुए हैं। भारतीय अध्यात्म परंपरा में स्वर्ग प्राप्ति को महत्वपूर्ण बताया गया है। महाभारत के रचनाकाल में स्वर्ग अति प्रतिष्ठित धारणा थी। महाभारत की कथा के अनुसार युधिष्ठिर अपने भाई व द्रोपदी के साथ स्वर्ग की यात्रा पर निकले। कथा के अनुसार उनका कुत्ता भी साथ था। स्वर्ग की दुर्गम पहाड़ियों में एक-एक पांडव गिरते गए। मरते गए अंत में द्रोपदी के भी गिर जाने के बाद कुत्ता ही जीवित शेष रहा। महाभारत में सभी पांडवों के देहावसान के कारण बताए गए हैं। युधिष्ठिर के कुत्ते का बच जाना उसकी निष्ठा का पुरस्कार था। कुत्ते अपने पालक के प्रति निष्ठावान रहते हैं। निष्ठा भी साधारण नहीं। अपने पालक के साथ स्वर्ग तक जाने की पात्रता ध्यान देने योग्य है। स्वर्ग प्राप्ति की पात्रता आश्चर्यजनक है।
कुत्तों को मारने का फतवा ठीक नहीं। कुत्तों की आंखों में आंख डालकर झांकना चाहिए। यहां आत्मीयता है। वे निर्दोष हैं। आंखें आत्मरस से लबालब हैं। वे किसी को भी चोट नहीं पहुंचाना चाहते। अपने पालक के प्रति अतकर््य निष्ठा दुर्लभ है उनमें। संसार में बड़े अनूठे जीव हैं। संसार जैव विविधता से भरा पूरा है। ऋग्वेद के एक प्रसंग में कुत्ते देवताओं की गाय चुरा लेते हैं। गायों की चोरी की घटना से देव व्यथित थे। ऋग्वेद की कथा के अनुसार देवों की कुतिया शर्मा ने चोरी गई गाय खोज निकालीं। गाय चोरी करने वालों ने शर्मा से कहा कि हम तुम यह गोधन परस्पर बांट लें। शर्मा ने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। उसकी अपनी वंश परंपरा में निष्ठा बहुत महत्वपूर्ण है। उसने कहा कि इन्द्र आ रहे हैं और अपनी गाय वापस ले जाएंगे। आचार्य सायण ने इस मंत्र सूक्त के आधार पर शर्मा को कुतिया होने के बावजूद देवता का सम्मान दिया है। शर्मा वैदिक देवता हैं।
गाय और घोड़े भी प्राचीन समाज में प्रतिष्ठित पशु रहे हैं, लेकिन तीनों की अलग-अलग प्रतिष्ठा है। गाय वैदिक समाज में माता हैं। घोड़ा उपयोगी है, लेकिन कुत्ते की बात ही अलग है। कुछ विद्वान बंदर को पूर्वज बताते हैं। बंदर में पूछ होती है। बाकी सब मनुष्य जैसा है। पूरी बात गले नहीं उतरती। मनुष्य में ईष्र्या होती है। हिंसा होती है। बेईमानी होती है। पशु बेईमान नहीं होते। भारतीय समाज में जीवों को अतिरिक्त आदर दिया गया है। गणेश गण देवता हैं। उनका वाहन एक छोटा सा पशु चूहा है। एक देवता कार्तिकेय हैं। उनका वाहन मोर है।
रूद्र शिव का वाहन वृषभ है। नंदी प्रतीक की चर्चा पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के बड़े भूभाग में प्रचलित है। वैसे भी शंकर पशुपति हैं। बिल्ली भी अपनी ओर से काटने नहीं दौड़ती। गिर जाने पर हाथ पैर चलाती है। समूचे पशु संसार को आदर के साथ मानना भारत में ही संभव है। ऐसे प्रतीक दुनिया की किसी अन्य संस्कृति में नहीं मिलते। सभी जीवों के प्रति आत्मीयता के सिद्धांत में सभी मनुष्यों के प्रति आत्मीयता का भाव अंतर्निहित है। प्रायः सभी जीव अपने आचरण से हिंसक नहीं होते। वे आत्मरक्षा में गलती कर सकते हैं।
पशु भारत की सम्मानित संपदा रहे हैं। इसके विपरीत पश्चिम एशिया और यूरोप के देशों में पशुओं के प्रति प्रेम भाव नहीं रहा है। संभवतः यूरोपीय देशों में मनुष्य और पशुओं के भीतर प्रवाहमान एक ही प्राण शक्ति का दार्शनिक भावबोध नहीं था। भारतीय दर्शन में मनुष्यों और पशुओं में तथा सभी जीवों में एक ही प्राण शक्ति का दर्शन हुआ है। भारत के आम जनों में सभी जीवों में एक ही प्राण शक्ति के दर्शन हुए हैं। हमारे परिचित देवाजी जायसवाल व अजय प्रताप सिंह कुत्तों, बंदरों व पक्षियों के प्रति संवेदनशील हैं। यह संवेदनशीलता प्रशंसनीय है।
गीता प्रबोधन में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से समूचे ब्रह्माण्ड में भिन्न-भिन्न प्रतिष्ठित प्रतीक के उल्लेख किए हैं। कृष्ण ने अर्जुन को बताया है कि, ”शस्त्रधारियों में राम मैं हूं।” राम यहां भगवत्ता के प्रतीक हैं। ऐसे ही उन्होंने गाय के बारे में कहा है कि, ”कामधेनु गाय मैं हूं। हाथियों में ऐरावत मैं हूं।” गाय सम्माननीय प्रतीक है। हाथी व सांप से लेकर सभी दिव्य प्रतीक¨ं का उल्लेख गीता में हुआ है।
बंदर को मनुष्य का पूर्वज कहा जाता है। यह सिद्धांत चार्ल्स डार्विन के विचार से लिया गया है। जहां डार्विन बंदर को पूर्वज बताते हुए प्रकृति के विकास का संकेत देते हैं। भारतीय परंपरा में हनुमान ज्ञान और बुद्धि के देवता हैं। हनुमान बुद्धि, बल और ज्ञान के देवता हैं। वे भक्ति और समर्पण का शिखर हैं। पशु ऋग्वेद के रचनाकाल के पहले से ही सम्माननीय हैं। ऋग्वेद के एक मंत्र (9.72.9) में ऋषि स्तुति करता है कि हमारा धन पशुओं से भरा पूरा हो और स्वर्ण से युक्त हो। यहां सोने की तरह पशुओं को भी धन के रूप में देखा गया है।
यूरोप के लोग मनुष्य को सोशल एनिमल मानते थे। मनुष्य उनकी दृष्टि में सामाजिक प्राणी हैं। भारत का मनुष्य अनेक संभावनाओं से भरा पूरा है। यहां वनस्पतियां आराध्य हैं। पृथ्वी आराध्य हैं। अंतरिक्ष आराध्य हैं। शक्ति का कण-कण उपास्य है। पश्चिम एशिया और यूरोप के देशों में पशुओं के प्रति आदर भाव नहीं रहा। ऋग्वेद में पशु सहित सभी प्राणी सम्माननीय हैं। यूरोप पर भारत के दृष्टिकोण में यह आधारभूत अंतर है।
























