
रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन को स्नेह की डोर में बांधता है। इस दिन बहन अपने भाई के मस्तक पर टीका लगाकर रक्षा का बन्धन बांधती है, जिसे राखी कहते हैं। यह एक हिन्दू व जैन त्योहार है जो प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। रक्षा के बंधन का त्योहार है रक्षाबंधन
रक्षाबन्धन पर्व सामाजिक और पारिवारिक एकबद्धता या एकसूत्रता का सांस्कृतिक उपाय रहा है। विवाह के बाद बहन पराये घर में चली जाती है। इस बहाने प्रतिवर्ष अपने सगे ही नहीं अपितु दूरदराज के रिश्तों के भाइयों तक को उनके घर जाकर राखी बाँधती है और इस प्रकार अपने रिश्तों का नवीनीकरण करती रहती है। दो परिवारों का और कुलों का पारस्परिक मिलन होता है। समाज के विभिन्न वर्गों के बीच भी एकसूत्रता के रूप में इस पर्व का उपयोग किया जाता है। इस प्रकार जो कड़ी टूट गयी है उसे फिर से जागृत किया जा सकता है।रक्षाबंधन पर्व को हम सभी भाई-बहन बड़े प्रेम और स्नेह के साथ हर साल मनाते हैं। बहनें थाल सजाकर भाई की आरती करती हैं और भगवान से प्रार्थना करती हैं कि उनका स्वस्थ और दीर्घायु हो। लेकिन क्या आप जानते हैं रक्षाबंधन मनाने की शुरुआज कलियुग नहीं बल्कि पौराणिक काल से ही हो चुकी थी। ऐसी मान्यता है कि सबसे पहले सतयुग से इस पर्व की शुरुआत हुई और मां लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षासूत्र बांधकर इस परंपरा का शुभारंभ किया। रक्षाबंधन के इतिहास को लेकर ऐसी ही कुछ और कहानियां भी प्रचलित हैं। आज हम इन्हीं कहानियों के बारे में आपको विस्तार से बताएंगे।
राजा बली का दान धर्म इतिहास में सबसे ज्सादा प्रख्यात है। एक बार मां लक्ष्मी ने राजा बलि को राखी बांधकर बदले में उनसे भगवान विष्णु को मांगा था। कहानी इस तरह है कि एक बार राजा बलि ने यज्ञ का आयोजन किया। तब उनकी परीक्षा लेने के लिए भगवान विष्णु वामनावतार लेकर आए और दानवीर राजा बलि से तीन पग भूमि मांग ली। बलि ने हां कह दिया तो वामनावतार ने 2 पग में ही सारी धरती और आकाश नाप लिया। राजा बलि समझ गए कि भगवान विष्णु स्वयं उनकी परीक्षा ले रहे हैं। तीसरा पग रखने के लिए उन्होंने भगवान के सामने अपना सिर आगे कर दिया। फिर उन्होंने भगवान से याचना की कि अब तो मेरा सबकुछ चला ही गया है, प्रभु आप मेरी विनती स्वीकारें और मेरे साथ पाताल में चलकर रहें। भगवान को भी भक्त की बात माननी पड़ी और विष्णुजी बैकुंठ छोड़कर पाताल चले गए। जब देवी लक्ष्मी को यह पता चला तो वह गरीब महिला का रूप धरकर बलि के पास पहुंची और राजा बलि को राखी बांध दी। बलि ने कहा कि मेरे पास तो आपको देने के लिए कुछ भी नहीं हैं, इस पर देवी लक्ष्मी अपने रूप में आ गईं और बोलीं कि आपके पास तो साक्षात श्रीहरि हैं और मुझे वही चाहिए। इस पर बलि ने भगवान विष्णु से माता लक्ष्मी के साथ जाने की विनती की। तब जाते वक्त भगवान विष्णु ने राजा बलि को वरदान दिया कि वह हर साल चार महीने पाताल में ही निवास करेंगे। यह चार महीने चर्तुमास के रूप में जाने जाते हैं। रक्षा के बंधन का त्योहार है रक्षाबंधन

जब युधिष्ठिर इंद्रप्रस्थ में राजसूय यज्ञ कर रहे थे उस समय सभा में शिशुपाल भी मौजूद था। शिशुपाल ने भगवान श्रीकृष्ण का अपमान किया तो श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया। लौटते वक्त सुदर्शन चक्र से कृष्णजी की छोटी उंगली घायल हो गई और रक्त बहने लगा। तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर श्रीकृष्ण की उंगली पर लपेट दिया। तब श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को वचन दिया कि वह इस रक्षा सूत्र का वचन निभाएंगे। इसके बाद जब कौरवों ने द्रौपदी का चीरहरण किया तो श्रीकृष्ण ने चीर बढ़ाकर द्रौपदी की लाज रखी। मान्यता है कि जिस दिन द्रौपदी ने श्रीकृष्ण की उंगली पर साड़ी का पल्लू बांधा था वह श्रावण पूर्णिमा ही थी।
मध्यकालीन भारत में यह पर्व समाज के हर हिस्से में मनाया जाने लगा। इसका श्रेय जाता है रानी कर्णावती को। उस वक्त चारों ओर एकदूसरे का राज्य हथियाने के लिए मारकाट चल रही थी। मेवाड़ पर महाराज की विधवा रानी कर्णावती राजगद्दी पर बैठी थीं। गुजरात का सुल्तान बहादुर शाह उनके राज्य पर नजरें गड़ाए बैठा था। तब रानी ने हुमायूं को भाई मानकर राखी भेजी। हुमायूं ने बहादुर शाह से रानी कर्णावती के राज्य की रक्षा की और राखी की लाज रखी।
आज भी रक्षा बंधन में राखी बांधते वक्त या किसी मंगल कार्य में मौली बांधते वक्त यह श्लोक बोला जाता है:-
‘येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे माचल-माचल:।।’
अर्थात् जिस रक्षा सूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बली को बांधा गया था, उसी रक्षा सूत्र से मैं तुम्हें बांधता-बंधती हूं, जो तुम्हारी रक्षा करेगा। हे रक्षे! (रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो या आप अपने वचन से कभी विचलित न होना।
हमें सबसे प्राचीन दो कथाएं मिलती है। पहली भविष्य पुराण में इंद्र और शची की कथा और दूसरी श्रीमद्भागवत पुराण में वामन और बाली की कथा। अब दोनों ही कथा का समय काल निर्धारित करना कठिन है। राजा बली भी इंद्र के ही काल में हुए थे। उन्होंने भी देवासुर संग्राम में भाग लिया था। यह ढूंढना थोड़ा मुश्किल है कि कौनसी घटना पहले घटी। फिर भी जानकार कहते हैं कि पहले समुद्र मंथन हुआ फिर वामन अवतार।
भविष्य पुराण में कहीं पर लिखा है कि देव और असुरों में जब युद्ध शुरू हुआ, तब असुर या दैत्य देवों पर भारी पड़ने लगे। ऐसे में देवताओं को हारता देख देवेंद्र इन्द्र घबराकर ऋषि बृहस्पति के पास गए। तब बृहस्पति के सुझाव पर इन्द्र की पत्नी इंद्राणी (शची) ने रेशम का एक धागा मंत्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति के हाथ पर बांध दिया। संयोग से वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। जिसके फलस्वरूप इंद्र विजयी हुए। कहते हैं कि तब से ही पत्नियां अपने पति की कलाई पर युद्ध में उनकी जीत के लिए राखी बांधने लगी।
दूसरी कथा हमें स्कंद पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत पुराण में मिलती है। कथा के अनुसार असुरराज दानवीर राजा बली ने देवताओं से युद्ध करके स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था और ऐसे में उसका अहंकार चरम पर था। इसी अहंकार को चूर-चूर करने के लिए भगवान विष्णु ने अदिति के गर्भ से वामन अवतार लिया और ब्राह्मण के वेश में राजा बली के द्वार भिक्षा मांगने पहुंच गए।
चूंकि राज बली महान दानवीर थे तो उन्होंने वचन दे दिया कि आप जो भी मांगोगे मैं वह दूंगा। भगवान ने बलि से भिक्षा में तीन पग भूमि की मांग ली। बली ने तत्काल हां कर दी, क्योंकि तीन पग ही भूमि तो देना थी। लेकिन तब भगवान वामन ने अपना विशालरूप प्रकट किया और दो पग में सारा आकाश, पाताल और धरती नाप लिया। फिर पूछा कि राजन अब बताइये कि तीसरा पग कहां रखूं? तब विष्णुभक्त राजा बली ने कहा, भगवान आप मेरे सिर पर रख लीजिए और फिर भगवान ने राजा बली को रसातल का राजा बनाकर अजर-अमर होने का वरदान दे दिया। लेकिन बली ने इस वरदान के साथ ही अपनी भक्ति के बल पर भगवान से रात-दिन अपने सामने रहने का वचन भी ले लिया।
भगवान को वामनावतार के बाद पुन: लक्ष्मी के पास जाना था लेकिन भगवान ये वचन देकर फंस गए और वे वहीं रसातल में बली की सेवा में रहने लगे। उधर, इस बात से माता लक्ष्मी चिंतित हो गई। ऐसे में नारदजी ने लक्ष्मीजी को एक उपाय बताया। तब लक्ष्मीजी ने राजा बली को राखी बांध अपना भाई बनाया और अपने पति को अपने साथ ले आईं। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी। तभी से यह रक्षा बंधन का त्योहार प्रचलन में हैं। रक्षा के बंधन का त्योहार है रक्षाबंधन























