Monday, May 11, 2026
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आकांक्षाओं और अविश्वास के बीच युवा

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आकांक्षाओं और अविश्वास के बीच युवा
आकांक्षाओं और अविश्वास के बीच युवा
अवनीश कुमार गुप्ता
अवनीश कुमार गुप्ता

युवाओं का टूटता भरोसा देश के लिए बड़ा खतरा?आकांक्षाओं और अविश्वास के बीच झूलता भारत का युवा आज केवल रोजगार की तलाश में नहीं, बल्कि व्यवस्था में अपने हिस्से की पहचान और सम्मान भी खोज रहा है। बेरोज़गारी, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताएँ और बढ़ती सामाजिक असमानताएँ युवाओं के भीतर गहरी बेचैनी पैदा कर रही हैं, जो अब लोकतांत्रिक विमर्श का अहम सवाल बनती जा रही है।

रोजगार,प्रतिनिधित्व और व्यवस्था के प्रति बढ़ता अविश्वास युवाओं के भीतर ऐसी बेचैनी को जन्म दे रहा है, जो केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श के बदलते स्वरूप का संकेत भी है। भारत इस समय विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में गिना जाता है। संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न जनसंख्या अध्ययनों के अनुसार देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है, जबकि 15 से 29 वर्ष के बीच के युवाओं की हिस्सेदारी लगभग 27 प्रतिशत मानी जाती है। लंबे समय तक इसे भारत की सबसे बड़ी शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया। कहा गया कि यह युवा ऊर्जा देश की अर्थव्यवस्था, विज्ञान, तकनीक और लोकतांत्रिक संरचना को नई ऊँचाइयों तक ले जाएगी। किंतु पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रकार बेरोज़गारी, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताएँ, अवसरों की असमानता और राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ा है, उसने इस तथाकथित “जनसांख्यिकीय लाभांश” के भीतर छिपे संकट को भी उजागर करना शुरू कर दिया है।

आज देश का एक बड़ा युवा वर्ग केवल नौकरी की तलाश में नहीं है; वह अपने अस्तित्व, प्रतिनिधित्व और भविष्य की विश्वसनीयता को लेकर भी गहरे संशय में दिखाई देता है। यही कारण है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी, नियुक्तियों में देरी या सरकारी नीतियों के विरोध में होने वाले प्रदर्शन अब केवल प्रशासनिक घटनाएँ नहीं रह गए हैं। वे धीरे-धीरे एक व्यापक सामाजिक बेचैनी का रूप लेते जा रहे हैं।

हाल के वर्षों में कई भर्ती परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने, परिणामों में अनियमितताओं और चयन प्रक्रियाओं में देरी ने युवाओं के भीतर व्यवस्था के प्रति गहरा अविश्वास पैदा किया है। यह अविश्वास इसलिए अधिक गंभीर है क्योंकि भारतीय समाज में शिक्षा को लंबे समय तक सामाजिक परिवर्तन और सम्मानजनक जीवन का सबसे विश्वसनीय माध्यम माना गया। एक किसान, मजदूर या निम्न-मध्यवर्गीय परिवार का युवा कठिन परिश्रम और प्रतियोगी परीक्षाओं के सहारे अपने जीवन की दिशा बदल सकता है—यह विश्वास भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी नैतिक शक्तियों में से एक रहा है।

लेकिन जब वर्षों की तैयारी के बाद परीक्षाएँ रद्द होती हैं, नियुक्तियाँ अदालतों में अटकती हैं या चयन प्रक्रिया विवादों में घिर जाती है, तब यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं रह जाती; यह उस सामाजिक अनुबंध को भी कमजोर करती है, जिसके आधार पर युवा व्यवस्था पर भरोसा करते हैं। यही कारण है कि आज युवाओं के भीतर नाराज़गी केवल बेरोज़गारी को लेकर नहीं, बल्कि व्यवस्था की निष्पक्षता को लेकर भी दिखाई देती है।

इस संकट की गंभीरता को समझने के लिए कुछ आँकड़ों पर ध्यान देना आवश्यक है। हाल के श्रम सर्वेक्षणों और आर्थिक अध्ययनों के अनुसार शहरी युवाओं में बेरोज़गारी दर कई अवधियों में पंद्रह से बीस प्रतिशत के बीच दर्ज की गई है। उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं में यह दर और अधिक पाई गई। इसका अर्थ यह है कि डिग्री और कौशल प्राप्त करने के बाद भी बड़ी संख्या में युवा स्थायी रोजगार पाने में असफल हैं।

दूसरी ओर, सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षण लगातार बढ़ता जा रहा है। इसका कारण केवल वेतन नहीं, बल्कि नौकरी की स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा भी है। कुछ वर्ष पहले रेलवे भर्ती की परीक्षा में लगभग 35 हजार पदों के लिए दो करोड़ से अधिक आवेदन प्राप्त हुए थे। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती परीक्षा में लगभग 60 हजार पदों के लिए 38 लाख से अधिक युवाओं ने आवेदन किया। यदि इन आँकड़ों को सरल अनुपात में समझा जाए, तो कई परीक्षाओं में एक पद के लिए सैकड़ों उम्मीदवार प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। यह केवल नौकरी पाने की इच्छा नहीं, बल्कि अवसरों की कमी का सार्वजनिक प्रमाण है।

यहाँ एक बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। एक ओर भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने का दावा करता है, दूसरी ओर बड़ी संख्या में युवा न्यूनतम अवसरों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सरकारें नवाचार, डिजिटल विकास और उद्यमिता की चर्चा करती हैं। देश में एक लाख से अधिक नवप्रवर्तन आधारित उद्यम पंजीकृत होने की बात कही जाती है। लेकिन दूसरी ओर वास्तविकता यह भी है कि बड़ी संख्या में युवा असंगठित क्षेत्र, अल्पकालिक कार्यों या संविदा आधारित रोजगार पर निर्भर हैं।

युवाओं की इस बेचैनी का संबंध केवल अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व से भी है। लोकतंत्र में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि समाज के विभिन्न वर्ग निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी महसूस करें। किंतु भारतीय राजनीति में युवा नेतृत्व की वास्तविक उपस्थिति सीमित दिखाई देती है। संसद और विधानसभाओं में औसत आयु लगातार बढ़ी है, जबकि दूसरी ओर देश की बड़ी आबादी युवा है। इससे यह भावना गहराती है कि जिन लोगों के हाथों में निर्णय प्रक्रिया है, वे युवा पीढ़ी की वास्तविक चुनौतियों को पर्याप्त रूप से नहीं समझ पा रहे।

सोशल मीडिया ने इस बेचैनी को नई भाषा दी है। आज भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 90 करोड़ से अधिक मानी जाती है और इनमें सबसे बड़ा हिस्सा युवाओं का है। यही कारण है कि राजनीतिक व्यंग्य, त्वरित प्रतिक्रियाएँ और डिजिटल अभियान लोकतांत्रिक असंतोष की नई अभिव्यक्ति बन चुके हैं। पहले जो बहस विश्वविद्यालय परिसरों या अख़बारों के संपादकीय पन्नों तक सीमित रहती थी, अब वह कुछ ही मिनटों में राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन जाती है।

लेकिन डिजिटल विस्तार का यह युग अपने साथ एक नई समस्या भी लेकर आया है। लगातार तुलना, सफलता की कृत्रिम छवियाँ और प्रचार आधारित राजनीतिक विमर्श युवाओं के भीतर असुरक्षा को और बढ़ाते हैं। एक ओर सामाजिक माध्यम उन्हें अभिव्यक्ति का मंच देते हैं, दूसरी ओर वही मंच उन्हें लगातार यह एहसास भी कराते हैं कि वे पीछे छूट रहे हैं। यह मनोवैज्ञानिक दबाव आज की युवा पीढ़ी की सबसे कम चर्चा की जाने वाली समस्याओं में से एक है।

युवाओं के भीतर बढ़ती राजनीतिक बेचैनी का एक कारण राजनीति की बदलती प्रकृति भी है। अब राजनीतिक विमर्श अधिकाधिक व्यक्तित्व-आधारित और प्रचार-केंद्रित होता जा रहा है। बड़े अभियानों, दृश्यात्मक राष्ट्रवाद और भावनात्मक नारों के बीच रोजगार, शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे प्रश्न कई बार गौण हो जाते हैं। इससे युवाओं के भीतर यह भावना उत्पन्न होती है कि उनकी वास्तविक समस्याओं की तुलना में प्रतीकात्मक मुद्दों को अधिक महत्व दिया जा रहा है।

विश्व के अन्य देशों में भी युवा असंतोष ने राजनीतिक परिवर्तनों को प्रभावित किया है। पश्चिम एशिया के देशों में हुए जनआंदोलनों से लेकर यूरोप और अमेरिका में छात्र प्रदर्शनों तक, युवाओं ने समय-समय पर सत्ता संरचनाओं को चुनौती दी है। भारत का लोकतांत्रिक ढाँचा निश्चित रूप से अधिक स्थिर और बहुलतावादी है, किंतु यह मान लेना कि केवल चुनावी प्रक्रिया ही लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रखेगी, पर्याप्त नहीं होगा। लोकतंत्र केवल मतदान से नहीं चलता; वह नागरिकों के विश्वास, सहभागिता और संस्थागत विश्वसनीयता पर भी निर्भर करता है।

इस पूरी परिस्थिति की सबसे चिंताजनक बात यह है कि युवाओं के भीतर निराशा धीरे-धीरे सामान्य होती जा रही है। प्रतियोगी परीक्षाओं में वर्षों की तैयारी, लगातार बढ़ती आयु सीमा, सीमित रिक्तियाँ और आर्थिक दबाव ने बड़ी संख्या में युवाओं को मानसिक तनाव की स्थिति में पहुँचा दिया है। ग्रामीण और निम्न-मध्यवर्गीय परिवारों में यह दबाव और अधिक दिखाई देता है, जहाँ परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा कोचिंग, परीक्षा शुल्क और शहरों में रहने पर खर्च कर देते हैं।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि आज का युवा केवल रोजगार नहीं चाहता; वह सम्मानजनक सहभागिता भी चाहता है। वह यह देखना चाहता है कि उसकी मेहनत, शिक्षा और आकांक्षाओं का मूल्यांकन निष्पक्षता से हो। यदि उसे बार-बार यह महसूस होता है कि निर्णय प्रक्रिया में योग्यता से अधिक प्रभाव, प्रचार या राजनीतिक समीकरणों की भूमिका है, तो उसके भीतर व्यवस्था के प्रति निराशा स्वाभाविक है। यह स्थिति केवल युवाओं का संकट नहीं है; यह लोकतंत्र के भविष्य का भी प्रश्न है। किसी भी समाज में युवा वर्ग आशा और परिवर्तन का वाहक माना जाता है। यदि वही वर्ग असुरक्षा, अविश्वास और हताशा से भरने लगे, तो उसका प्रभाव केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहता; वह सामाजिक संबंधों, सांस्कृतिक दृष्टिकोण और आर्थिक संरचना को भी प्रभावित करता है।

आवश्यकता इस बात की है कि युवाओं की बेचैनी को केवल कानून-व्यवस्था या चुनावी गणित के संदर्भ में न देखा जाए। यह एक गहरे सामाजिक संक्रमण का संकेत है। यह समय है कि शिक्षा, रोजगार, प्रतिनिधित्व और मानसिक स्वास्थ्य जैसे प्रश्नों को केवल घोषणाओं के स्तर पर नहीं, बल्कि संस्थागत गंभीरता के साथ पुनर्विचारित किया जाए। क्योंकि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी नहीं होती; बल्कि वह विश्वास होता है जिसके सहारे युवा अपने भविष्य की कल्पना करते हैं। और जब वही विश्वास कमजोर पड़ने लगे, तब संकट केवल आर्थिक नहीं रह जाता—वह लोकतांत्रिक चेतना की जड़ों तक पहुँचने लगता है।