Sunday, February 22, 2026
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हरियाणा में एचआईवी: पहचान मजबूत, रोकथाम अभी अधूरी

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हरियाणा में एचआईवी: पहचान मजबूत, रोकथाम अभी अधूरी
हरियाणा में एचआईवी: पहचान मजबूत, रोकथाम अभी अधूरी
डॉ.सत्यवान सौरभ
    डॉ.सत्यवान सौरभ
    वित्तीय वर्ष 2025–26 में हरियाणा सरकार द्वारा 12.4 लाख से अधिक लोगों की एचआईवी जांच और 5877 पॉजिटिव मामलों की पहचान—यह तथ्य पहली दृष्टि में सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र की सक्रियता, प्रशासनिक इच्छाशक्ति और नीति-स्तरीय गंभीरता का प्रमाण प्रतीत होता है। इतने बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग किसी भी राज्य के लिए न तो सरल होती है और न ही सहज। इसके लिए वित्तीय संसाधन, प्रशिक्षित मानवबल, संस्थागत ढांचा और निरंतर निगरानी की आवश्यकता होती है। इस दृष्टि से देखें तो यह उपलब्धि हरियाणा की स्वास्थ्य व्यवस्था की क्षमता और प्राथमिकताओं को दर्शाती है।
यह पहल इस बात का भी संकेत है कि राज्य ने एचआईवी को अब केवल “सीमित समुदायों” या “हाशिये के समूहों” से जोड़कर देखने के पुराने और संकीर्ण नजरिये से आगे बढ़कर एक व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में स्वीकार किया है। लेकिन यही आंकड़े जब गहराई से पढ़े जाते हैं, तो वे एक साथ यह चेतावनी भी देते हैं कि संक्रमण की सामाजिक, आर्थिक और व्यवहारिक जड़ें अभी भी मजबूत बनी हुई हैं। सवाल यह नहीं है कि कितने लोगों की जांच हुई, बल्कि यह है कि संक्रमण को जन्म देने वाले कारणों पर कितनी प्रभावी रोक लगी।
राज्य में 104 एकीकृत परामर्श एवं परीक्षण केंद्र (ICTC) और 24 एंटी-रेट्रोवायरल थेरेपी (ART) केंद्रों का संचालन इस बात का संकेत देता है कि जांच के बाद मरीजों को इलाज की निरंतर श्रृंखला से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। 40,000 से अधिक लोगों का नियमित उपचार यह स्पष्ट करता है कि नीति केवल घोषणाओं और काग़ज़ी योजनाओं तक सीमित नहीं है। एचआईवी जैसे दीर्घकालिक और आजीवन प्रबंधन की मांग करने वाले रोग में इलाज की निरंतरता उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी प्रारंभिक पहचान। इस मोर्चे पर हरियाणा की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत दिखती है, जो कई अन्य राज्यों के लिए एक सीख भी हो सकती है।
इस अभियान का सबसे सकारात्मक और दूरगामी प्रभाव गर्भवती महिलाओं की बड़े पैमाने पर जांच में दिखाई देता है। 5.65 लाख से अधिक गर्भवती महिलाओं की स्क्रीनिंग और 613 पॉजिटिव मामलों की पहचान यह दर्शाती है कि माँ-से-बच्चे में संक्रमण रोकने को गंभीरता से प्राथमिकता दी जा रही है। चिकित्सा विज्ञान यह स्पष्ट कर चुका है कि यदि समय रहते एचआईवी संक्रमित गर्भवती महिला को उपचार और परामर्श मिल जाए, तो नवजात को संक्रमण से लगभग पूरी तरह बचाया जा सकता है। यह केवल एक चिकित्सा सफलता नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है, क्योंकि एचआईवी-मुक्त शिशु को उस कलंक और भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता, जो आज भी संक्रमित बच्चों के जीवन को सीमित कर देता है।
दिसंबर 2021 से लागू ₹2250 प्रतिमाह की वित्तीय सहायता योजना—जिसके तहत अब तक ₹54.3 करोड़ वितरित किए जा चुके हैं—यह संकेत देती है कि राज्य सरकार बीमारी को केवल चिकित्सा समस्या के रूप में नहीं देख रही। एचआईवी से प्रभावित व्यक्ति अक्सर रोजगार, सामाजिक स्वीकार्यता और आर्थिक स्थिरता—तीनों से वंचित हो जाता है। बीमारी के साथ जुड़ा सामाजिक भय और भेदभाव उसकी आजीविका के अवसरों को भी सीमित कर देता है। ऐसे में यह वित्तीय सहायता इलाज के साथ जीवन की बुनियादी गरिमा बनाए रखने का एक प्रयास है, भले ही मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में यह राशि अपर्याप्त प्रतीत हो।
फिर भी, कुल जांच के मुकाबले 0.47 प्रतिशत की पॉजिटिविटी दर को हल्के में नहीं लिया जा सकता। सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से यह मानते आए हैं कि एचआईवी के मामले अक्सर वास्तविक संख्या से कम रिपोर्ट होते हैं। सामाजिक कलंक, भय, गोपनीयता को लेकर आशंका और जानकारी की कमी के कारण बड़ी संख्या में लोग स्वैच्छिक जांच से बचते हैं। ऐसे में सामने आए 5877 मामले संभवतः समस्या की पूरी तस्वीर नहीं, बल्कि उसका एक सीमित हिस्सा मात्र हैं। यह दर राज्य में मौजूद उन सामाजिक कारकों की ओर भी संकेत करती है, जो संक्रमण को बढ़ावा देते हैं—जैसे नशीली दवाओं का बढ़ता दुरुपयोग, असुरक्षित यौन व्यवहार, तेज़ शहरीकरण और प्रवासी श्रमिकों की अस्थिर जीवन-स्थितियां।
यौनकर्मी, ट्रक चालक, निर्माण श्रमिक और नशीली दवाओं के आदी लोग आज भी संक्रमण की श्रृंखला में सबसे अधिक जोखिम में हैं। इनके लिए चलाई जा रही लक्षित परियोजनाएं और ओपिओइड प्रतिस्थापन केंद्र निस्संदेह सही दिशा में कदम हैं, लेकिन इनकी पहुंच और प्रभाव अभी भी सीमित दिखाई देता है। नशे की समस्या को केवल उपचार या दवा वितरण तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। जब तक इसे सामाजिक पुनर्वास, रोजगार के अवसरों और मानसिक स्वास्थ्य समर्थन से नहीं जोड़ा जाता, तब तक एचआईवी नियंत्रण अधूरा ही रहेगा।
इस पूरी लड़ाई में सबसे बड़ी और सबसे अदृश्य बाधा आज भी कलंक है। लोग बीमारी से कम और समाज की प्रतिक्रिया से अधिक डरते हैं। एचआईवी आज भी नैतिकता, चरित्र और “गलती” के साथ जोड़कर देखा जाता है, जबकि यह एक चिकित्सकीय स्थिति है। यही सोच लोगों को जांच से दूर रखती है, इलाज में देरी कराती है और संक्रमण को चुपचाप फैलने का अवसर देती है। रेड रिबन क्लब, रेडियो जिंगल और सोशल मीडिया अभियानों से जागरूकता बढ़ी है, लेकिन ग्रामीण इलाकों और पारंपरिक सामाजिक संरचनाओं तक यह संदेश अभी भी पूरी मजबूती से नहीं पहुंच पाया है।
एचआईवी नियंत्रण को केवल स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी मानना एक बड़ी रणनीतिक भूल होगी। सुरक्षित प्रवास, श्रमिक कल्याण, नशामुक्ति, लैंगिक समानता और वैज्ञानिक यौन शिक्षा—ये सभी विषय सीधे इस समस्या से जुड़े हैं। प्रवासी श्रमिकों के लिए कार्यस्थल पर जांच, परामर्श और इलाज की व्यवस्था न केवल संक्रमण को नियंत्रित कर सकती है, बल्कि उनकी उत्पादकता और सामाजिक सुरक्षा भी बढ़ा सकती है। परिवहन, श्रम, शिक्षा और महिला एवं बाल विकास विभागों के साथ समन्वय के बिना कोई भी प्रयास स्थायी परिणाम नहीं दे सकता।
भारत के “एड्स मुक्त” लक्ष्य को हासिल करने में राज्यों की भूमिका निर्णायक है। राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन द्वारा तय की गई रणनीतियों को ज़मीनी स्तर पर लागू करने में हरियाणा जैसे संसाधन-संपन्न और प्रशासनिक रूप से सक्षम राज्य अगर संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हैं, तो वे केवल आंकड़ों में सफलता हासिल नहीं करेंगे, बल्कि नीति-मॉडल के रूप में भी उभर सकते हैं।
अंततः, हरियाणा का एचआईवी जांच अभियान निस्संदेह एक बड़ी उपलब्धि है। इसने यह साबित किया है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक प्रतिबद्धता के साथ बड़े पैमाने पर सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप संभव हैं। लेकिन यह सफलता तभी पूर्ण मानी जाएगी जब इसके साथ जुड़ी चेतावनियों को गंभीरता से सुना जाए। यदि राज्य कलंक तोड़ने, रोकथाम को इलाज जितनी प्राथमिकता देने और संक्रमण के सामाजिक कारणों पर ईमानदारी से काम करने में सफल होता है, तो आज के आंकड़े कल की सफलता की कहानी बनेंगे। अन्यथा, यही आंकड़े भविष्य के एक बड़े और गहरे संकट का शुरुआती संकेत बनकर रह जाएंगे।