

लखनऊ। डिजिटल दुनिया में जो कुछ सालों से चल रहा था, उस पर आखिरकार सरकार ने सख्त ब्रेक लगा दिया है। मोबाइल फोन, सस्ते इंटरनेट और नई तकनीक ने हर हाथ में कैमरा और हर दिमाग को कंटेंट बनाने की ताकत दे दी। इसी ताकत के गलत इस्तेमाल ने फर्जी वीडियो, बदली हुई आवाज़ और नकली तस्वीरों की बाढ़ ला दी। किसी नेता का बयान हो, किसी अभिनेता का वीडियो या किसी आम आदमी की आवाज़ सब कुछ कुछ मिनटों में इस तरह बदला जाने लगा कि सच और झूठ का फर्क मिटता चला गया। इसी खतरे को देखते हुए सरकार ने अब सोशल मीडिया के लिए ऐसा नियम बनाया है, जो सीधे असर डालने वाला है।
नए नियमों के मुताबिक अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को आपत्तिजनक या गैरकानूनी कंटेंट हटाने के लिए 36 घंटे नहीं, बल्कि सिर्फ तीन घंटे मिलेंगे। मतलब यह कि अगर कोई फर्जी या भ्रामक वीडियो वायरल होता है, तो उसे घंटों या दिनों तक चलने नहीं दिया जाएगा। तीन घंटे के भीतर उसे हटाना प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी होगी। यह नियम 20 फरवरी 2026 से लागू होगा और फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब जैसे बड़े प्लेटफॉर्म भी इससे बाहर नहीं होंगे।
भारत में सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वालों की संख्या 90 करोड़ के आसपास पहुंच चुकी है। हर दिन करोड़ों फोटो, वीडियो और रील्स अपलोड होते हैं। ऐसे में एक गलत वीडियो कितनी तेजी से फैल सकता है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कई बार कुछ ही मिनटों में लाखों लोग उसे देख लेते हैं। पिछले एक-दो साल में ऐसे कई मामले सामने आए, जहां बदली हुई आवाज़ से लोगों से पैसे ठग लिए गए, नकली वीडियो से अफवाहें फैलीं और तस्वीरों को गलत संदर्भ में दिखाकर माहौल खराब किया गया। सरकारी आंकड़ों में भी माना गया है कि डिजिटल ठगी और भ्रम फैलाने वाले मामलों में बड़ी संख्या में बदले हुए वीडियो और ऑडियो का इस्तेमाल हुआ।
सरकार का दूसरा बड़ा फैसला यह है कि अब हर बदले हुए या मशीन से बने कंटेंट पर साफ-साफ लेबल दिखाना जरूरी होगा। यानी अगर कोई फोटो, वीडियो या आवाज़ असली नहीं है, बल्कि तकनीक से बनाई या बदली गई है, तो उसे देखकर ही यह बात समझ में आ जानी चाहिए। अब तक सबसे बड़ी दिक्कत यही थी कि आम आदमी यह पहचान ही नहीं पाता था कि जो वह देख रहा है, वह सच है या बनाया गया भ्रम। नए नियम इस भ्रम को कम करने की कोशिश हैं।
इस बदलाव का सीधा असर कंटेंट बनाने वालों पर पड़ेगा। अब तक कई लोग जानबूझकर ऐसे वीडियो बनाते थे, जो असली लगें और ज्यादा से ज्यादा शेयर हों। चेहरे बदलना, आवाज़ कॉपी करना या किसी पुराने वीडियो को नए संदर्भ में पेश करना आम बात हो गई थी। अब यह सब बिना पहचान के नहीं चलेगा। अगर किसी ने जानबूझकर बदले हुए कंटेंट को असली बताकर पोस्ट किया और उस पर लेबल नहीं लगाया, तो उसका अकाउंट सस्पेंड या बैन भी हो सकता है। बार-बार नियम तोड़ने पर कानूनी परेशानी का रास्ता भी खुल सकता है।सोशल मीडिया कंपनियों के लिए यह नियम सबसे बड़ी चुनौती लेकर आया है। तीन घंटे में किसी पोस्ट पर फैसला लेना आसान काम नहीं है।
खासकर तब, जब हर मिनट हजारों वीडियो अपलोड हो रहे हों। कंपनियों को अब ज्यादा मॉडरेशन टीम, बेहतर तकनीक और भारत के हालात के हिसाब से अलग सिस्टम बनाना पड़ेगा। सिर्फ यूज़र की बात पर भरोसा नहीं चलेगा। प्लेटफॉर्म्स को खुद भी जांच करनी होगी कि कंटेंट बदला हुआ है या नहीं। यह काम तकनीकी तौर पर मुश्किल है, क्योंकि आज के नकली वीडियो इतने असली लगते हैं कि मशीनें भी कई बार धोखा खा जाती हैं।
आम यूज़र के लिए यह बदलाव राहत की तरह है। अब जब वह सोशल मीडिया खोलेगा, तो उसे हर वीडियो पर आंख बंद करके भरोसा नहीं करना पड़ेगा। अगर किसी पोस्ट पर साफ लिखा होगा कि यह बदला हुआ है, तो वह उसे उसी नजर से देखेगा। इससे अफवाहों और झूठी खबरों को आगे बढ़ाने की आदत पर कुछ हद तक रोक लग सकती है। हालांकि एक खतरा यह भी है कि अगर बहुत ज्यादा पोस्ट पर ऐसे टैग दिखने लगे, तो लोग उन्हें नजरअंदाज करने लगें। ऐसे में लेबल को समझदारी से और साफ तरीके से दिखाना भी उतना ही जरूरी होगा।
इस फैसले का असर सोशल मीडिया के कारोबार पर भी पड़ेगा। आज रील्स और शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। इनमें बड़ी संख्या में बदला हुआ या मशीन से बना कंटेंट चलता है। अब जब उस पर सख्त निगरानी और लेबलिंग होगी, तो एंगेजमेंट के तरीके बदल सकते हैं। कुछ लोग ऐसे कंटेंट से दूरी बना सकते हैं। दूसरी तरफ विज्ञापन देने वाली कंपनियों के लिए यह राहत की खबर है, क्योंकि उन्हें अब ज्यादा सुरक्षित माहौल मिलेगा और उनके ब्रांड का नाम किसी फर्जी या विवादित कंटेंट से जुड़ने का खतरा कम होगा।
सरकार ने साफ किया है कि नियम न मानने पर प्लेटफॉर्म्स को जिम्मेदारी से बचने का मौका नहीं मिलेगा। यानी अगर किसी मामले में लापरवाही हुई, तो कानूनी जवाबदेही तय की जा सकती है। यही वजह है कि आने वाले समय में सोशल मीडिया कंपनियों को भारत में ज्यादा निवेश करना पड़ेगा। ज्यादा लोग, ज्यादा जांच और ज्यादा जवाबदेही तीनों अब जरूरी होंगे।हालांकि रास्ता आसान नहीं है। बदले हुए वीडियो को डाउनलोड करके फिर से अपलोड किया जा सकता है। एक प्लेटफॉर्म से हटाया गया कंटेंट दूसरे पर पहुंच सकता है। तकनीक भी अभी पूरी तरह भरोसेमंद नहीं है।
कई बार असली को नकली और नकली को असली मान लेने की गलती हो जाती है। लेकिन इसके बावजूद सरकार का मानना है कि बिना सख्त कदम के हालात और बिगड़ते।कुल मिलाकर यह फैसला सोशल मीडिया के लिए एक मोड़ जैसा है। अब यहां सब कुछ चलेगा वाली सोच खत्म होने वाली है। कंटेंट बनाना सिर्फ वायरल होने का खेल नहीं रहेगा, उसमें जिम्मेदारी भी जुड़ेगी। गलत जानकारी फैलाने की कीमत चुकानी पड़ेगी। शुरुआत में दिक्कतें आएंगी, विवाद होंगे और सिस्टम पर दबाव बढ़ेगा, लेकिन लंबे वक्त में इससे डिजिटल दुनिया में भरोसा लौटने की उम्मीद है। सच और झूठ के बीच जो धुंध छा गई थी, उसे हटाने की यह एक गंभीर कोशिश है।
























